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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

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दंड प्रक्रिया संहिता/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

CrPC/BHARATIYA NAGARIK SURAKSHA SANHITA, 2023

 

सामान्य सिद्धान्त

(GENERAL PRINCIPLES)

1.      शिवजी सिंह बनाम नागेंद्र तिवारी, .आई.आर. 2010 एससी 2261

दण्ड संहिता के प्रावधानों की व्याख्या मान्यता प्राप्त सिद्धांतों के आलोक में की जाएगी। प्रक्रियात्मक विधि मौलिक रूप से न्याय करने के लिए समझे जाते हैं।

2.      मोवु बनाम सुपरिटेंडेंट स्पेशर जेल, नाउगांग, असम (1971) 3 एससीसी 936,

 

सप्तवाना बनाम असम राज्य, (1972) 4 एससीसी () 945 एन,

 

नागा पीपल्स मूवमेंट ऑफ ह्यूमन राइट्स बनाम भारत संघ, 1998 2 एससीसी 109

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि हालांकि दं. प्र. नागालैंड के कुछ जिलों में लागू नहीं हैं, इसका अर्थ केवल यह है कि द. प्र. सं. के नियम वहाँ लागू नहीं होंगे, लेकिन वहाँ के प्राधिकरण एवं अधिकारी इन नियमों के मूल भाव द्वारा नियंत्रित होंगे।

 

3.      एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल एक्सीक्यूशन विक्टिम फैमिलीज बनाम भारतीय संघ, (2016) 14 एससीसी 536 अन्य

अधिनियमितियां जो प्रक्रियाओं को निर्धारित करती हैं वे द. प्र. सं. से प्रभावित नहीं होंगी। यदि ऐसा कानून विशेष रूप से लागू प्रक्रिया के लिए प्रदान करता है और दं. प्र. सं. के प्रभाव को कम करते हैं।

 

न्यायालय की शक्तियाँ

(POWER OF COURTS)

4.      शरद हिरू कोलम्बे बनाम महाराष्ट्र(2018) 18 एससीसी 718

जुर्माना देने में व्यतिक्रम होने पर दिया गया दण्डादेश, मुख्य कारावास के अतिरिक्त या उसकी समाप्ति के बाद शुरू होना चाहिए। व्यतिक्रम कारावास का मुख्य कारावास के समवर्ती चलना या होना स्वीकार्य नहीं है।

5.      गगन कुमार बनाम पंजाब राज्य, (2019) 5 एससीसी 154

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यह विनिर्दिष्ट करना एक अनिवार्य विधिक आवश्यकता है कि दो या अधिक अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए अभियुक्तों को दिया गया कारावास समवर्ती या लगातार (एक के बाद एक) चलेगा।

6.      प्रेमनाथ बनाम राजस्थान राज्य .आई.आर. 1967 एससी 1599

एक दीवानी न्यायाधीश को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की शक्तियाँ नहीं दी जा सकतीं, जब तक कि उन्हें दं. प्र. सं. के धारा 9 के तहत अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के रूप में नियुक्त नहीं किया गया हो।

7.      गोकरू बनाम रंगराजू, .आई.आर. 1981 एससी 1473

सत्र न्यायाधीश द्वारा दिए गए, निर्णयों को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है कि उनकी नियुक्ति को बाद में अवैध ठहरा दिया गया।

 

गिरफ्तारी

(ARREST)

8.      डी. के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, (1997) 6 एस सी 642

गिरफ्तारी के लिए दिशा निर्देश-

(क) पूछताछ तथा गिरफ्तारी को सौंपने वाले पुलिस कर्मियों को उनके पदनाम के साथ सही और स्पष्ट पहचान चिह्न लगाना चाहिए।

(ख) गिरफ्तारी करने वाला पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी का ज्ञापन तैयार करेगा जो कम से कम एक गवाह द्वारा सत्यापित किया जाएगा।

(ग) गिरफ्तार व्यक्ति अपने मित्र या रिश्तेदार को अपनी गिरफ्तारी के बारे में सूचित करने का हकदार होगा।

(घ) उसे अपने गिरफ्तारी के बारे में किसी को सूचित करने के लिए अपने अधिकार से अवगत होना चाहिए।

(ङ) गिरफ्तारी के समय गिरफ्तार व्यक्ति की जांच की जानी चाहिए और हर बड़ी या छोटी-मोटी चोट का पता लगाना चाहिए।

(च) गिरफ्तार व्यक्ति का प्रत्येक 48 घंटे में एक प्रशिक्षित डॉक्टर द्वारा चिकित्सकीय जांच करवाना चाहिए।

(छ) गिरफ्तारी का ज्ञापन सहित सभी दस्तावेजों की प्रतियां मजिस्ट्रेट को रिकार्ड के लिए भेजी जानी चाहिए।

(ज) बन्दी को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।

(झ) उसे पूछताछ के दौरान एक वकील से मिलने की अनुमति दी जानी चाहिए।

(ञ) प्रत्येक जिले और राज्य मुख्यालय में पुलिस नियंत्रण कक्ष उपलब्ध कराया जाए।

9.      दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विसेज एसोसिएशन बनाम गुजरात राज्य और अन्य, E.T.C. AIR (1991) 4 2176

एक न्यायिक अधिकारी को गिरफ्तार करने के लिए उच्चतम न्यायालय में निम्नलिखित दिशा-निर्देश धारित किए हैं-

(क) किसी अपराध के लिए किसी न्यायिक अधिकारी को जिला न्यायाधीश या उच्च न्यायालय को सूचित करते हुए गिरफ्तार किया जाना चाहिए।

(ख) तत्काल गिरफ्तारी की आवश्यकता हो तो केवल तकनीकी अथवा औपचारिक गिरफ्तारी की जानी चाहिए।

(ग) गिरफ्तारी का तथ्य तुरंत जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया जाना चाहिए।

(घ) संबंधित जिले के जिला और सत्र न्यायाधीश के पूर्व आदेश या निर्देशन के बिना न्यायिक अधिकारी को पुलिस स्टेशन नहीं ले जाया जाएगा।

(ङ) आमतौर पर, न्यायिक अधिकारी को हथकड़ी नहीं लगाना चाहिए।

(च) अपने परिवार के सदस्यों, कानूनी सलाहकारों और न्यायिक अधिकारियों के साथ संचार के लिए न्यायिक अधिकारी को तत्काल सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए।

(छ) न्यायिक अधिकारी का, जो गिरफ्तारी के अधीन है, कोई बयान दर्ज नहीं किया जाना चाहिए और न ही किसी पंचनामा को तैयार किया जाना चाहिए और न ही, न्यायिक अधिकारी के विधि सलाहकार की उपस्थिति के अलावा, चिकित्सा परीक्षण किए जाने चाहिए।

10.  सोशल एक्शन फोरम फॉर मानव अधिकार बनाम भारत संघ, (2018) 10 एससीसी 443

 

अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, 2014 8 एससीसी 273

गिरफ्तारी का विधि एक तरफ व्यक्तिगत अधिकारों, स्वतंत्रता और विशेषाधिकारों को संतुलित करने के लिए है एवं दूसरी ओर व्यक्तिगत कर्तव्यों, दायित्वों और जिम्मेदारियों को भी संतुलित करना है।

किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी आयोग द्वारा केवल आरोप कारित किये जाने के बाद नियमित रूप से कोई गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।

किसी वास्तविक और प्रमाणित शिकायत पर यह युक्ति-युक्त विश्वास हो कि कोई व्यक्ति अपराध में संलिप्त है, तो बिना कुछ अन्वेषण जो युक्ति-युक्त संतुष्टि इंगित करता है गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए।

एक व्यक्ति जो कि एक ऐसे अपराध का आरोपी है जो सात साल से कम या सात साल तक की कारावास, जो जुर्माने के बिना या जुर्माने के साथ दंडनीय है, ऐसे व्यक्ति को पुलिस द्वारा तब तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता जब तक कि धारा 41 (1) (बी) के तहत उल्लिखित शर्तों का पालन नहीं किया जाता है।

11.  हरियाणा राज्य बनाम दिनेश कुमार, (2008) 3 एससीसी 222

 

अभिरक्षा और गिरफ्तारी एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं हैं। हर गिरफ्तारी में अभिरक्षा निहित है या होती है, लेकिन इसके विपरीत हर अभिरक्षा में गिरफ्तारी नहीं होती है। अभिरक्षा में कुछ मामलों में गिरफ्तारी हो सकती है लेकिन सभी मामलों में नहीं। अभिरक्षा में शारीरिक नियंत्रण या न्यायालय में अभियुक्तों की पेशी ही न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में प्रस्तुत करना है। एक व्यक्ति केवल तभी अभिरक्षा में हो सकता है जब पुलिस उसे गिरफ्तार करे या जब वह न्यायालय के सामने आत्मसमर्पण करें।

12.  जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1994) 4 एससीसी 96

प्रथम सूचना रिपोर्ट का पंजीकरण और अभियुक्त व्यक्ति की गिरफ्तारी दो अलग-अलग विषय हैं। यह कहना सही नहीं है कि केवल प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत मात्र से ही आरोपी को गिरप्तार किया जा सकता है।

13.  शीला बरसे बनाम महाराष्ट्र राज्य, (1983) 2 एससीसी 96

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्त व्यक्ति को मजिस्ट्रेट द्वारा उसके चिकित्सीय जांच के अधिकार के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।

14.  अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, (2014) 8 एससीसी 273

जहां धारा 498A भा.द.सं. के तहत मामला दर्ज किया गया हो वहीं पुलिस अधिकारियों को निदेशित किया गया कि वे स्वतः गिरफ्तारी न करें और ऐसे मामले जहां अपराध के लिए 7 साल या उससे कम कारावास की सजा है, उन्हें धारा 41 दण्ड प्रक्रिया संहिता में निर्धारित मापदंडों के तहत गिरफ्तारी की आवश्यकता के बारे में पहले अपने आप को संतुष्टि करना होगा।

15.  इंदर मोहन गोस्वामी बनाम उत्तरांचल राज्य, (2007) 12 एससीसी 1

गिरफ्तारी और कारावास का अर्थ है व्यक्ति को उसके बहुमूल्य अधिकार से वंचित करना है। इसलिए गैर-जमानती वारंट जारी करने से पहले न्यायालय को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। जिस प्रकार स्वतंत्रता व्यक्ति के लिए अनमोल है, उसी प्रकार कानून और व्यवस्था बनाए रखना समाज के लिए हितकारी है। दोनों एक सभ्य समाज के अस्तित्व के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। किसी व्यक्ति को न्यायालय में लाने के लिए गैर-जमानती वारंट तब जारी किया जाना चाहिए जब समन या ज़मानती वारंट से वांछित परिणाम प्राप्त करने की संभावना नहीं हो। यह तब हो सकता है जब-

1.      यह युक्ति-युक्त है कि व्यक्ति स्वेच्छा से न्यायालय में पेश नहीं होगा।

2.      पुलिस अधिकारी व्यक्ति को समन तामील के लिए उसे खोजने में असमर्थ रहे हों।

3.      यह विचार है कि अगर उस व्यक्ति को तुरंत हिरासत में नहीं लिया गया तो वह किसी को नुकसान पहुंचा सकता है।

 

भरण-पोषण

(MAINTENANCE)

16.  भगवान दत्त बनाम कमला देवी, (1975) 2 एस.सी.सी. 386

उच्चतम न्यायालय ने संहिता की धारा 125 के निम्नलिखित उद्देश्यों को निर्धारित किया है-

1.      धारा 125 के तहत यह उपचार सिविल न्यायालयों के द्वारा लागू किए गए उपचार की तुलना में तेजी और किफायती है। तो, यह जरूरतमंद लोगों के लिए फायदेमंद होगा।

2.      यह निराश्रितता और दासता को रोकने को उद्देशियत करता है।

17.  वी. डी. भनोट बनाम सविता भनोट, (2012) 3 एस.सी.सी. 183

'पत्नी' की परिभाषा का विस्तार तलाकशुदा पत्नी को आवरण में लेने का उद्देश्य है, की बेईमान पतियों को पत्नियों के वैध दावों को उन्हें तलाक देकर निराश करने से रोकना है। इस व्याख्या का उद्देश्य है गरीब वर्गों की स्त्री को सामाजिक न्याय प्रदान करना है।

18.  मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम, आई आर 1985 एस.सी. 945

सुप्रीम कोर्ट ने धारित किया कि धारा 125 और मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के बीच कोई टकराव नहीं है। न्यायालय ने धारित किया कि मुस्लिम व्यक्तिगत विधि में पति का यह दायित्व सीमित है किं वह तलाकशुदा पत्नी को इद्दत की अवधि तक बनाये रखे। अगर तलाकशुदा पत्नी अपने आप को बनाए रखने में सक्षम हो जाती है तो पति की देनदारी इदत्त की अवधि के बाद समाप्त हो जाती है। हालांकि, यदि तलाकशुदा पत्नी स्वयं को बनाए रखने में असमर्थ है, तो वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 का सहारा लेने का हकदार है। धारा 125 तलाकशुदा मुस्लिम महिला पर तब तक लागू होती है जब तक वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती।

19.  डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ, (2001) 7 एस.सी.सी. 74

अधिनियम की संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि 1986 की धारा 3 (1) (क) के तहत रख-रखाव का उचित और न्यायसंगत प्रावधान उनकी पत्नी की इदत्त अवधि की अवधि से आगे बढ़ाया जाएगा और यह इद्दत अवधि के भीतर किया जाएगा।

20.  बेगम सबानो बनाम एम अब्दुल गफूर, (1987) 2 एस.सी.सी. 285

मुस्लिम विधि के तहत पुनर्विवाह की अनुमति है और पति दूसरे विवाह के लिए आपराधिक दायित्व नहीं है। तथापि, एक मुस्लिम पत्नी निश्चित रूप से अलग रह सकती है और इस आधार पर भरण-पोषण का दावा कर सकती है कि उसके पति के दूसरे विवाह से उसको मानसिक पीड़ा और क्रूरता हुई है। ऐसी स्थिति में पति अपने व्यक्तिगत विधि का आश्रय नहीं ले सकता और धारा 125 से उन्मुक्ति का दावा नहीं कर सकता।

21.  नानक चंद्र बनाम चन्द्र किशोर, (1969) 3 एससीसी 802

धाराओं 125-128 में निहित प्रावधान, सभी धर्मों के सभी व्यक्तियों पर लागू होते हैं और उनका पक्षों के व्यक्तिगत कानूनों से कोई संबंध नहीं है।

22.  यमुनाबाई बनाम अंनन्तराओ, .आई.आर. 1988 एससी 644

 

सविताबेन बनाम गुजरात राज्य, .आई.आर. 2005 एससी 1089

पत्नी शब्द का अर्थ है विधिक रूप से विवाहिता पत्नी। दूसरी पत्नी भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।

 

23.  डॉ. स्वपन कुमार बनर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं एक अन्य, आपराधिक अपील सं. () 232-233, 2015 19.09.19 को निर्णीत

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक पत्नी, जिसे उसके पति द्वारा इस आधार पर तलाक दिया गया है कि उसकी पत्नी ने उसका अभित्याग कर दिया है, वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है।

24.  डी. बेलूसामी बनाम डी पतचाइअम्मल, (2010) 10 एससीसी 469

एक महिला जो विवाह जैसे रिश्ते में है, हालांकि कानूनी रूप से विवाहित नहीं है, वह भरण-पोषण का दावा कर सकती है। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि सभी लिव-इन-रिलेशनशिप विवाह के संबंधों की प्रकृति के अनुरूप नहीं होंगे। 'विवाह की प्रकृति वाले' संबंध को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना चाहिए-

1.      पुरुष और महिला दोनों को पति या पत्नी के रूप में समाज में खुद को प्रदर्शित करना चाहिए।

2.      उन्हें शादी करने के लिए कानूनी उम्र का होना चाहिए।

3.      उन्हें विधिक विवाह में प्रवेश करने के लिए अन्य रूप से योग्य होना चाहिए।

4.      उन्हें निश्चित अवधि से स्वेच्छा से सहवास में होना चाहिए।

25.  विजय मनोहर बनाम काशी राव राजा राम, .आई.आर. 1987 एससी 1100"

बेटी भी (चाहे शादीशुदा हो या नहीं) भरण-पोषण देने के लिए उत्तरदायी होगी।

26.  चतुर्भुज बनाम सीताबाई, (2008) 2 एससीसी 316

स्वयं का भरण-पोषण में असमर्थ” शब्दावली से तात्पर्य उस स्थिति से है कि जो साधन जबकि वह पति के साथ रहती थी उसे उपलब्ध थे परित्यक्त होने के बाद पत्नी स्वयं के प्रयास से जीवन निर्वाह के लिए वह उस साधन को जुटा नहीं सकती है।

27.  कमला बनाम एम. आर. मोहन कुमार, (2019) 11 एससी 491

धारा 125 दं. प्र. सं. के कल्याणकारी विधान की सही भावना को पूरा करने के लिए विवाह के कठोर प्रभाव भार की आवश्यकता नहीं है। महिला और पुरुष के बीच लंबे समय तक सहवास में रहने से विवाह को उपधारण किया जा सकता है जिससे महिला और उनसे पैदा हुए बच्चे के लिए भरण-पोषण का अधिकार उत्पन्न होगा। यह एक खण्डनीय उपधारणा है।

28.  रीमा साल्कन बनाम सुमेर सिंह साल्कन, (2019) 12 एससीसी 303

धारा 125 दं. प्र. सं. के तहत पत्नी के लिए भरण-पोषण की मात्रा तय करने के लिए पत्नी विधिक रूप से उसी तरह से जीवन जीने की हकदार है जैसा कि वह अपने पति के साथ घर में रहती थी। यह देखना पति का वैधानिक दायित्व है कि पत्नी बेसहारा न हो।

 

 

निवारक कार्यवाही

(PREVENTIVE ACTION)

29.  अनीता ठाकुर बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य, (2016) 15 एससीसी 525

विधि विरुद्ध जमाव को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग के आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को स्वयं को संतुष्ट करने की आवश्यकता है-

1.      जहाँ एक विधिविरुद्ध जमाव हिंसा करने के इरादे से एकत्रित हुआ है या पाँच या पाँच से अधिक लोगों द्वारा लोक शांति को भंन करने की संभावना हो।

2.      कार्यपालक दंडाधिकारी को विधिविरुद्ध जमाव को हटाने का आदेश देना चाहिये। और

3.      इस तरह के आदेश के बावजूद विधि विरुद्ध जमाव न हो।

 

जाँच-पड़ताल

(INVESTIGATION)

30.  एच. एन. ऋषबद बनाम दिल्ली राज्य, .आई.आर. 1955 एससी 196

अपराध का अन्वेषण आम तौर पर सम्मिलित करता है-

1.      मौके पर पहुँचना;

2.      मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का पता लगाना;

3.      अपराध की खोज और गिरफ्तारी;

4.      अपराध के कारित किये जाने से संबंधित साक्ष्य का संग्रह। इसमें विभिन्न व्यक्तियों की परीक्षा और विभिन्न चीजों की खोज और अभिग्रहण शामिल हो सकता है;

5.      एकत्रित की गई सामग्री के आधार पर अभिमत का गठन, कि अभियुक्त ने अपराध किया है या नहीं।

31.  हबीब बनाम बिहार राज्य, (1972) 4 एससीसी 773

प्रथम सूचना रिपोर्ट का उद्देश्य है-

1.      आपराधिक कानून को गति प्रदान करना।

2.      सूचना देने वाले से कथित अपराध की प्रारंभिक जानकारी प्राप्त करना और उसकी याददाश्त कमजोर पड़ने से पहले उसे लिखना

32.  उत्तर प्रदेश राज्य बनाम रघुवीर, (2018) 13 एससीसी 732

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने में देरी आमतौर पर संदेह की दृष्टि से देखी जाती है क्योंकि मनगढ़ंत बातों (कहानी) की संभावनाएं बढ़ जाती हैं और साक्ष्य न्यायालय द्वारा गलत परिशीलन के अधीन है। इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अभियुक्त को दोषसिद्धि और दंडाविष्ट करना और मामले के तथ्य और परिस्थितियों में अन्य अभियुक्तों के विरुद्ध कोई संपुष्टिकारी साक्ष्य न होने के कारण उन्हें संदेह का फायदा देकर दोषमुक्त करना न्यायोचित होगा।

33.  मध्य प्रदेश राज्य बनाम छक्की लक, (2019) 12 एससीसी 326, सतपाल बनाम हरियाणा राज्य, (2018) 6

एससीसी 610, लतेश बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2018) 3 एससीसी 66 प्रथम सूचना रिपोर्ट कोई विश्वकोश नहीं है, जिसमें घटना के हर मिनट का विवरण दर्ज हो।

34.  सुनील खेरगड़े बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2016) 15 एससीसी 773

प्रथम सूचना रिपोर्ट में जरूरी नहीं कि मृतक को लगी प्रत्येक चोट का विवरण हो।

35.  मोतीराम पाडु जोशी बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2018) 9 एससीसी 429

हमलावरों या गवाहों के नाम के लोप होने से हर समय अभियोजन के लिए क्षतिकारक नहीं हो सकती है यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट बिना देरी के दर्ज की जाती है।

36.  सोमा भाई बनाम गुजरात राज्य, (1973) 3 एससीसी 114

एक टेलिफोनिक संदेश भी अगर यह एक संज्ञेय अपराध का खुलासा करता है तो एक प्रथम सूचना रिपोर्ट का हो सकता है।

37.  पर्तइ उर्फ कृष्ण कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, .आई.आर. 2010 एससी 2254

सूचना को प्रथम सूचना रिपोर्ट के रूप में योग्य होने के लिए एक संज्ञेय अपराध के बारे में शिकायत या अभियोग की प्रकृति में होना चाहिए। घटना को रिकॉर्ड करने वाले एक गुप्तसंदेश को प्रथम सूचना रिपोर्ट नहीं कहा जा सकता है।

38.  हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल, 1992, Supp (1) एससीसी 335

धारा 154 में सूचना शब्द युक्ति-युक्तता पद से विशेषित नहीं है, युक्ति-युक्तता और विश्वसनीयता शब्द के लोप से विधानमंडल का यह स्पष्ट अभिप्राय है कि पुलिस को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का विवेक नहीं दिया गया है।

39.  ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार, 2013 (13) स्केल 559

प्रथम सूचना रिपोर्ट का पंजीकरण, धारा 154 के तहत अनिवार्य है यदि सूचना एक संज्ञेय अपराध होना प्रकट करती है और उस स्थिति में प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है। हालांकि कुछ प्रकार के मामलों में प्रारंभिक जांच को प्रथम सूचना रिपोर्ट के पंजीकरण से पहले

किया जा सकता है। ये मामले हैं-

1.      वैवाहिक/पारिवारिक विवाद

2.      वाणिज्यिक अपराध

3.      चिकित्सा में लापरवाही के मामले

4.      भ्रष्टाचार के मामले

5.      ऐसे मामले जहां आपराधिक कार्यवाही शुरू करने में असामान्य विलंब हुआ है।

40.  सोशल एक्शन फोरम फॉर मानव अधिकार बनाम भारतीय संघ, (2018) 10 एससीसी 443

वैवाहिक/पारिवारिक विवादों से संबंधित मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट के पंजीकरण से पहले प्रारंभिक जांच हो सकती है। प्रारंभिक जांच का अर्थ सूचना की सत्यता को सत्यापित करना नहीं है, बल्कि यह पता लगाना है कि इत्तिला किसी संज्ञेय अपराध का होना प्रकट करती है या नहीं।

41.  गजानन दशरथ खराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2016) 4 एससीसी 604; एवं मुकेश बनाम राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, (2017) 2 एससीसी (दं.) 673

प्रथम सूचना रिपोर्ट के त्वरित पंजीकरण पर जोर देने का उद्देश्य आरोपी के बारे में न केवल प्रारंभिक जानकारी प्राप्त करना है, बल्कि अभियुक्त की भूमिका, घटना की प्रकृति और गवाहों के नाम के बारे में भी जानकारी प्राप्त करना है।

42.  दामोदर प्रसाद चन्द्रिका प्रसाद बनाम महाराष्ट्र राज्य, (1972) 1 एससीसी 107

प्रथम सूचना रिपोर्ट एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है और यह आपराधिक विधि को गति प्रदान करता है। यह साध्य का मुख्य भाग नहीं है जैसा कि इसमें दर्ज तथ्यों का पक्ष है।

43.  अघ्नू नागेसिया बनाम बिहार राज्य, .आई.आर. 1966 एससी 119

प्रथम सूचना रिपोर्ट का उपयोग भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 157 के तहत सूचना को संपुष्ट करने या उक्त अधिनियम की धारा 145 के तहत खंडन के लिए किया जा सकता है, यदि विचारण के समय शिकायतकर्ता को गवाह के रूप में बुलाया जाता है।

44.  ओड़ीसा राज्य बनाम शरत चंद्र साहू, (1966) 6 एससीसी 435

संज्ञेय अपराध का अन्वेषण करते समय, पुलिस को उसी तथ्य से उत्पन्न होने वाले किसी भी असंज्ञेय अपराध के बारे में अन्वेषण करने से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है।

45.  एच. एन. ऋषबद बनाम दिल्ली राज्य, .आई.आर. 1955 एससी 196

धारा 156 (2) यह स्पष्ट करती है कि अन्वेषण में किसी भी प्रकार की अनियमितता न्यायालय के विचारण को दूषित (vitiate) नहीं करेगी।

46.  दिलावर सिंह बनाम दिल्ली राज्य, (2007) 12 एससीसी 641

यहां तक कि एक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई है और भले ही पुलिस ने अन्वेषण किया हो, या वह अन्वेषण कर रही हो जिसे पीड़ित व्यक्ति पर्याप्त नहीं समझता तो, ऐसा व्यक्ति धारा 156 (3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास जा सकता है और अगर मजिस्ट्रेट उसकी बातों से संतुष्ट होते हैं, तो वह एक उचित अन्वेषण का आदेश दे सकते हैं और उपयुक्त कदम उठा सकते हैं।

47.  श्रीनिवास गुंडलुरी बनाम सेप्को इलेक्ट्रिक पॉवर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन, (2010) 8 एससीसी 2006

यदि कोई परिवाद दर्ज की जाती है तब भी परिवाद पर संज्ञान लेने के स्थान पर मजिस्ट्रेट, धारा 156 (3) के तहत अन्वेषण का आदेश दे सकता है।

48.  सकीरी वसु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2008) 2 एससीसी 409, सुधीर भास्करराव ताँबे बनाम हेमंत यशवंत धागे, (2016) 6 एससीसी 277

मजिस्ट्रेट के पास किसी भी व्यक्त शक्तियों को प्रभावी बनाने के लिए अंतर्निहित और आकस्मिक शक्तियां हैं। जब मजिस्ट्रेट धारा 156 (3) के तहत अन्वेषण का आदेश देता है और पुलिस अधिकारी अन्वेषण नहीं करता या अनुचित तरीके से करता है तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में अपील करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मजिस्ट्रेट स्वयं के पास अनुषंगिक शक्तियां हैं कि वह धारा 156 (3) के तहत अन्वेषण के दूसरे आदेश या उचित अन्वेषण के आदेश को पारित कर सके। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मजिस्ट्रेट अन्वेषण में हस्तक्षेप करेंगे।

49.  . आर. अन्तुले बनाम आर. एस. नायक, (1992) 1 एससीसी 225,

 

पी. रामचंद्र राव बनाम कर्नाटक राज्य, (2002) 4 एससीसी 578

न्यायालय अन्वेषण की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करेगी क्योंकि यह कार्यपालिका का विशेषाधिकार है।

50.  सुरेश चंद्र जैन बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2001) 42 एसीसी 459

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मजिस्ट्रेट के पास धारा 156 (3) के तहत एक आवेदन को परिवाद के रूप में मानने का अधिकार है।

51.  राजस्थान राज्य बनाम दाउद खान, (2016) 2 एससीसी 521

 

सूचना के "तत्काल" संचार का उद्देश्य हेरफेर की संभावना की जांच करना है।

52.  बथुल्ला नगमलेश्वर राव बनाम स्टेट, (2008) 3 सुप्रीम 129

धारा 157 और 159 की संयुक्त पठन स्पष्ट रूप से बताता है कि घटना की रिपोर्ट भेजने का उद्देश्य अभियोजन के कथानक को बढ़ा-चढ़ा कर कहने से रोकना है।

53.  नंदिनी सतपथी बनाम पी. एल. डानी, (1978) 2 एससीसी 424

अनुच्छेद 20 (3) और धारा 161 (2) के अंतर्गत क्षेत्र काफी हद तक मूलतः समान है और धारा 161 (2) संवैधानिक खंड पर एक संसदीय टिप्पणी है।

54.  रघुनन्दन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1974) 4 एससीसी 186

धारा 162 की परास (scope) पक्षकारों के उपयोग के लिए सीमित है। न्यायालय किसी भी प्रश्न को पूछ सकता है जो कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत सहसंबंध या विरोधाभास के संबंध में हो सकता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-162, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 को नियंत्रित नहीं करता है।

55.  हरबीर सिंह बनाम शीशपाल, (2016) 16 एससीसी 418

गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी होने से यह जरूरी नहीं कि उनकी गवाही को खारिज कर दिया जाए। न्यायालय ऐसे गवाहों पर भरोसा कर सकती है यदि उनके बयान ठोस और विश्वसनीय हैं और विलंब के कारण को न्यायालय की संतुष्टि के लिए स्पष्टीकरण दिया गया हो।

56.  वीरेंद्र सिंह बनाम हरियाणा राज्य, (2017) 11 एससीसी 126

धारा 161 के तहत दर्ज किए गए बयान ऐसे साक्ष्य नहीं है जिसे न्यायालय द्वारा ठोस साक्ष्यों के अभाव में अभियुक्तों को दोषी ठहराने के लिए प्रयोग में लाया जा सके।

57.  दीपक भाई जगदीश चंद्र पटेल बनाम गुजरात राज्य, (2019) 16 एससीसी 547

धारा 162 दं. प्र. सं. की रोक, केवल अन्वेषण की शुरूआत से लेकर अन्वेषण की समाप्ति तक संचालित होती है। ऐसे बयान के संबंध में, जो संस्वीकृति (confession) को निर्मित नहीं करता है, लेकिन स्वीकृति के रूप में सुसंगत है, जो कि अन्वेषण शुरू होने से पहले दिया जाता है, तो इस तरह के बयान को स्वीकार्य बनाया जा सकता है तो धारा 162 का संचालन नहीं होगा।

58.  रघुनन्दन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1974) 4 एससीआर 186

संहिता की धारा 311 के तहत किसी व्यक्ति को न्यायालय के गवाह के रूप में परीक्षा करने या भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत किसी भी गवाह से कोई भी सवाल पूछने के लिए न्यायालय पिछले बयानों का उपयोग कर सकती है इसमें, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 162 के तहत लगाए गए प्रतिबंध लागू नहीं होंगे।

59.  तहसीलदार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, .आई.आर. 1959, एससी 1012

अन्वेषण के दौरान पुलिस के सामने दिए गए बयान में किसी महत्वपूर्ण तथ्यों का लोप (omissions) को बयान का हिस्सा माना जाता है और यह एक खंडन की कोटि का हो सकता है।

60.  सीबीआई बनाम अनुपम कुलकर्णी, (1992) 3 एसएससी 141

गिरफ्तारी के 15 दिन बाद पुलिस रिमांड बहाल नहीं किया जाना चाहिए।

61.  हुसैनारा खातून (5) बनाम बिहार राज्य, (1980) 1 एससीसी 108

मजिस्ट्रेट का यह कर्त्तव्य है कि वह अभियुक्त को सूचित करे कि उसे धारा 167 (परन्तुक) के तहत जमानत पर रिहा होने का अधिकार है।

62.  संजय दत्त बनाम स्टेट, (1994) 4 एससीसी 410;

 

असलम बाबालाल देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्य, (1992) 4 एससीस 272

धारा 167 (परन्तुक) के तहत दी गई जमानत तब तक वैध है जब तक कि उसे रद्द नहीं किया जाता है और न्यायालय में आरोप-पत्र की प्राप्ति स्वयं जमानत रद्द करने का कोई आधार नहीं है।

63.  दिनेश डालमिया बनाम सीबीआई, (2007) 8 एससीसी 413

 

जब तक पुलिस रिपोर्ट धारा 173 (2) के तहत दर्ज नहीं की जाती है, तब तक अन्वेषण लंबित रहती है। धारा 173 (2) के तहत रिपोर्ट प्रस्तुत करने से धारा 173 (8) के तहत आगे की विवेचना प्रतिबंधित नहीं होती है।

64.  भारत संघ बनाम प्रकाश हिंदुजा, 2003 क्रि. एल. जे. 3117 (एससी)

अभिमत के निर्माण जिस मामले के अग्रेषण को सही ठहराने के लिए पर्याप्त सबूत या संदेह का उचित आधार है या नहीं यह तय करने की जिम्मेदारी थाने के प्रभारी अधिकारी की है और इस संदर्भ में मजिस्ट्रेट की कोई भूमिका नहीं है।

65.   अभिनंदन झा बनाम दिनेश मिश्र, ए.आई.आर. 1968 एससी 117

मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी को आरोप-पत्र प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।

66.  संपत सिंह बनाम हरियाणा राज्य, (1993) 1 एससीसी 561

यदि अंतिम रिपोर्ट दायर की जाती है, तो न्यायालय को अंतिम रिपोर्ट की जांच करनी चाहिए और यह निर्णय लेना चाहिए कि इसे स्वीकार करना है या अस्वीकार।

67.  भगवंत सिंह बनाम पुलिस कमिश्नर, (1985) 2 एससीसी 537

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि शिकायतकर्ता को मजिस्ट्रेट द्वारा मामले को खारीज करने से पहले सुना जाना चाहिए।

68.  यूथ बार एसो गएशन ऑफ इंडिया बनाम भारतीय संघ, .आई.आर. 2016 एससी 4136

यह निर्धारित किया गया था कि एक अभियुक्त दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के तहत प्रारंभिक स्तर पर प्रथम सूचना रिपोर्ट की एक प्रति पाने का हकदार है। प्रथम सूचना रिपोर्ट 24 घंटे के भीतर पुलिस वेबसाइट पर अपलोड की जानी चाहिए, जब तक कि मामला पौन अपराधों, उग्रवाद, आतंकवाद जैसे संवेदनशील अपराधों के विषय में ना हो।

69.  परविंदरजीत सिंह बनाम स्टेट (केंद्र शासित प्रदेश, चंडीगढ़) (2008) 4 एससीसी 2873

अन्वेषणकर्ता की भूमिका को अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है और अन्वेषण की प्रक्रिया में न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप का क्षेत्राधिकार सीमित है। न्यायालय आमतौर पर किसी अपराध के अन्वेषण या संज्ञेय अपराध में अभियुक्तों की गिरफ्तारी के साथ हस्तक्षेप नहीं करेगी।

70.  सुनील बनाम मध्य प्रदेश, (2017) 4 एससीसी 393

अभियुक्त से लिए गए नमूनों के डीएनए परीक्षण करने में विफलता या डीएनए प्रोफाइलिंग की रिपोर्ट को साबित करने में विफलता का परिणाम अभियोजन के मामले की होगी विफलता नहीं। शेष साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि संभव हो सकती है।

71.  काठी डेविड राजू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (2019) 7 एससीसी 769

डीएनए द्वारा व्यक्ति की पहचान के लिए दिया गया निर्देश पर्याप्त जांच आधारित एकत्र की गई सामग्रियों पर पुलिस अधिकारियों की संतुष्टि पर निर्भर होनी चाहिए। डीएनए परीक्षण को मूलतः साक्ष्यों की खोज एवं जांच के लिए एक मनमाने ढंग से अनुरोध या निर्देशित नहीं किया जा सकता है।

72.  स्टेट बनाम एच. श्रीनिवास, (2018) 7 एससीसी 572

सामान्य डायरी के रखरखाव का दायित्व संबंधित अधिकारी के आचरण का एक हिस्सा है। सामान्य डायरी के गैर-रखरखाव का आपराधिक मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ सकता है जब तक कि मामले की मूल में जाने वाले कुछ गंभीर पूर्वाग्रह नहीं दिखाए जाते हैं।

73.  योगेश सिंह बनाम महावीर सिंह, (2017) 11 एससीसी 195; अंजन दासगुप्ता बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, (2017) 11 एससीसी 222

धारा 157 के संदर्भ में, संबंधित पुलिस अधिकारी को प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रति अविलम्ब मजिस्ट्रेट को अग्रेषित करना आवश्यक है, जो ऐसे अपराध को तुरंत और बिना किसी विलम्ब के संज्ञान लेने के लिए अधिकार रखता है। इसे सार्वभौमिक अनुप्रयोग के नियम के रूप में नहीं रखा जा सकता है कि जब भी मजिस्ट्रेट को प्रथम सूचना रिपोर्ट भेजने में देरी होती है, अभियोजन संस्करण अविश्वसनीय हो जाता है। यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट को तुरंत दर्ज किया गया था और प्रथम सूचना रिपोर्ट के आधार पर अन्वेषण शुरू हो गई है, तो अभियुक्त को किसी भी पूर्वाग्रह के अभाव में यह नहीं कहा जा सकता है कि अन्वेषण सही तरीके से नहीं की गयी थी और अभियोजन की कहानी अविश्वसनीय है।

74.  बलाक्रम बनाम उत्तरांचल राज्य, (2017) 7 एससीसी 668

पुलिस डायरी में प्रविष्टियों के संदर्भ में पुलिस अधिकारी को प्रतिपरीक्षा करने के लिए अभियुक्त का अधिकार काफी हद तक सीमित है और यहां तक कि सीमित दायरा तब ही उत्पन्न होता है जब पुलिस अधिकारी अपनी स्मृति को ताजा करने के लिए इसका उपयोग करता है और यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 145 और 161 के प्रावधानों के अधीन है। धारा 172 में न्यायालय, अभियोजन या अभियुक्त को पुलिस अधिकारी के अलावा किसी भी गवाह के खंडन के लिए पुलिस डायरी का उपयोग करने में सक्षम बनाने की कोई गुंजाइश नहीं है। न्यायालय के पास पुलिस अधिकारी द्वारा बनाए गए पुलिस डायरियों में प्रविष्टियों की जांच करने और मंगाने की असीमित शक्ति है।

75.  ईश्वर प्रताप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2018) 13 एससीसी 612

कोई भी बाह्य अधिकरण (Agency) किसी आपराधिक मामले में अन्वेषण की विधि तय नहीं कर सकती। यह पुलिस के विशेष अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत है। न्यायालय अन्वेषण की निगरानी नहीं कर सकता केवल असाधारण परिस्थितियों में ही वरिष्ठतम न्यायालय जांच की निगरानी कर सकता है लेकिन यह पर्यवेक्षण के समान नहीं है।

76.  राकेश कुमार पॉल बनाम असम राज्य, (2017) 15 एससीसी 67

यदि जांच 60 दिनों या 90 दिनों के भीतर पूरी नहीं होती है, जैसा भी मामला हो, और कोई पुलिस रिपोर्ट 60वें या 90वें दिन दर्ज नहीं की जाती है, तब अभियुक्त को अप्रतिबंधित जमानत का अधिकार मिल जाता है। अभियुक्त को व्यतिक्रम जमानत के लिए आवेदन करना चाहिए और जमानत प्रस्तुत करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

77.  अमृतभाई शम्भूभाई पटेल बनाम सुमनभाई कांतिभाई पटेल, (2017) 4 एससीसी 177

मजिस्ट्रेट धारा 173 (2) के तहत पुलिस रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद भी आगे के अन्वेषण (investigation) का निर्देश दे सकता है। आगे के अन्वेषण का दिशानिर्देश धारा 156 (3) के तहत संज्ञान लेने से पर्व दिया जा सकता है।

78.  अतुल राव बनाम कर्नाटक राज्य, (2018) 14 एससीसी 298

एक बार अभियोग के विरचित करने एवं संज्ञान लेने के बाद न तो मजिस्ट्रेट के द्वारा संज्ञान लेने न ही परिवादी द्वारा दायर आवेदन पा आगे के अन्वेषण का निर्देश दिया जा सकता है। जांच एजेंसी के अनुरोध पर ही आगे के अन्वेषण के आदेश दिए जा सकते हैं और वह भी केवल अहम साक्ष्य मिलने की परिस्थितियों में निष्पक्ष अन्वेषण के लिए।

79.  तहसीन पूनावाला बनाम भारतीय संघ, (2018) 6 एससीसी 72; योगेश सिंह बनाम महाबीर सिंह, (2017) 11 एससीसी 195

मृत्यु-समीक्षा रिपोर्ट एक ठोस सबूत नहीं है। इसका उद्देश्य चोटों की दशा तथा गम्भीरता और मौत के कारण का पता लगाने तक सीमित है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि मृत्यु आत्मघाती, दुर्घटना या जानवरों या मशीनरी आदि के कारण है या नहीं, यह बताता है कि किस तरीके से या किस हथियार या उपकरण से चोटें आई हैं।

80.  रितेश सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2019) 8 एससीसी 1

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक न्यायिक मजिस्ट्रेट एक अभियुक्त को उसकी सहमति के बिना भी अन्वेषण के लिए उसकी आवाज के नमूने उपलब्ध कराने का निर्देश दे सकता है।

81.  वीनूभाई हरिभाई मालवीय एवं अन्य बनाम गुजरात राज्य, (2019) 3 एएलटी क्रि0 284 (एससी)

मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने के बाद भी धारा 156 (3) दं. प्र. सं. के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।

82.  तेलांगाना राज्य बनाम श्री मानगीपेट एट मांगिपेट सर्वेश्वर रेड्डी, क्रि. अपील सं. 1662 of 2019 06.12.2019 को निर्णीत

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि सभी भ्रष्टाचार मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं है।

83.  बिकाश रंजन राउत बनाम स्टेट, (2019) 5 एससीसी 542

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मजिस्ट्रेट जब अभियुक्त को बरी कर चुका हो तो, उनके पास स्वतः संज्ञान के माध्यम से आगे का अन्वेषण/पुनःअन्वेषण करने का आदेश देने का अधिकार नहीं होता है।

84.  रामस्वरूप सोनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य, क्रि. अपील सं. 614 of 2019 08.04.2019 को निर्णीत

सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः निर्धारित किया कि एक मजिस्ट्रेट, क्लोजर (closure) या संदर्भ रिपोर्ट प्राप्त होने पर, पुलिस को आरोप पत्र दाखिल करने का निर्देश नहीं दे सकती है। इस तरह का निर्देश पूरी तरह से अमान्य है।

 

अधिकार क्षेत्र

(JURISDICTION)

85.  रुपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2019) 5 एससीसी 384

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जिस स्थान पर पत्नी अपने पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता के कृत्यों के कारण वैवाहिक घर छोड़ने या भगाए जाने के बाद शरण लेती है, उस स्थान के न्यायालय के पास भी धारा 498 ए भारतीय दंड संहिता के तहत अपराधों के आरोपों के तहत परिवाद दर्ज कराने का अधिकार क्षेत्र होता है।

86.  स्टेट (राष्ट्रीय राजधानी, दिल्ली) बनाम बृजेश सिंह, (2017) 10 एससीसी 779

अगर अपराध एक राज्य में किया जाता है, तो दूसरे राज्य में उसके खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है, अगर उस राज्य में अपराध का हानिकारक प्रभाव पड़ा है। 'अपराध स्थानीय है' '(crime is local) सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू नहीं होता है।

 

संज्ञान

(COGNIZANCE)

87.  नरेंद्र कुमार श्रीवास्तव बनाम बिहार राज्य, (2019) 3 एस.सी.सी. 318

अभियोजन की शुरूआत केवल न्यायालय की स्वीकृति से ही की जा सकती है जिसके विरुद्ध कार्यवाही अपराध धारा 195 (1) (ख) सी.आर.पी.सी. में कथित रूप से निर्दिष्ट किया गया था। निजी शिकायत अनुमत नहीं है।

88.  एम. एल. सेठी बनाम आर. एल. कपूर, .आई.आर. 1967 एससी 528

संज्ञान लेने (taking cognizance) शब्द का अभिप्राय को संहिता में परिभाषित नहीं किया गया है। इस अभिव्यक्ति का उपयोग उस बिंदु को इंगित करने के लिए किया जाता है जब मजिस्ट्रेट आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए अपराध की न्यायिक सूचना लेता है।

89.  एचडीएफसी सिक्युरिटीज लि० बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2017) 1 एससीसी 640

धारा 190 (1) में 'संज्ञान ले सकता है' को 'संज्ञान लेना होगा' के साथ मेल नहीं किया जा सकता है। यह शब्द 'संज्ञान ले सकता है' के मामले में मजिस्ट्रेट को स्वविवेक के उपयोग करने की आजादी दी गयी है। यदि शिकायत में दर्ज तथ्य संज्ञेय अपराध का खुलासा नहीं करते हैं, तो परिवाद प्राप्त करने पर मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने के लिए बाध्य नहीं होता है। यदि परिवाद को पढ़ने पर मजिस्ट्रेट को किसी संज्ञेय अपराध के आरोप का पता चलता है तो वह संज्ञान लेने के बजाय पुलिस को परिवाद को धारा 156 (3) के तहत अन्वेषण के लिए अग्रेसित कर सकता है। वह संज्ञान लेने के विकल्प के रूप में इस प्रक्रिया को अपनाने में सक्षम होगा।

90.  सुब्रह्मण्यम स्वामी बनाम मनमोहन सिंह, .आई.आर. 2012 एससी 1185

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संज्ञान लेना न्यायालय द्वारा ऐसे मामले पर न्यायिक सूचना लेना है जिसमें न्यायालय का अधिकार क्षेत्र हो, ताकि यह तय किया जा सके कि क्या प्रस्तुत मामले में कार्यवाही शुरू करने का कोई आधार है।

91.  फखरूद्दीन अहमद बनाम उत्तरांचल राज्य, (2008) 4 क्रि. एल. जे. 4377 (एससी)

जब मजिस्ट्रेट इस बात से संतुष्ट होता है कि लगाए गए आरोप, यदि सिद्ध हो जाते हैं, तो वह अपराध को गठित करेगा और मजिस्ट्रेट कथित अपराध के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने का फैसला करता है, तो यह सकारात्मक रूप से कहा जा सकता है कि मजिस्ट्रेट ने अपराध पर संज्ञान ले लिया है।

92.  मनहारी भाई बनाम शैलेश भाई, (2012) 10 एससीसी 527

संज्ञान लेने का तात्पर्य आदेशिका जारी करना नहीं है।

93.  अजय कुमार परमार बनाम राजस्थान राज्य, (2012) 9 स्केल 542

धारा 190 के तहत अपनी शक्ति के प्रयोग में मजिस्ट्रेट न्यायालय के समक्ष मौजूद तथ्यों के आधार पर संज्ञान लेने से इनकार कर सकता है। मजिस्ट्रेट न्यायिक कार्य करता है, लेकिन वह निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए मौजूद साक्ष्य का मूल्यांकन (Appreciate) नहीं कर सकता है। मजिस्ट्रेट के लिए इस स्तर पर संभावना को संतुलित करने के लिए सबूतों का उपयोग करना अमान्य और अनुचित है।

94.  महेंद्र सिंह धोनी बनाम येरगुंटला श्यामसुंदर, (2017) 7 एससीसी 760

मजिस्ट्रेट जिसके पास संज्ञान लेने और प्रक्रिया जारी करने की शक्ति है उसे सावधानीपूर्वक संवीक्षा करनी चाहिए कि क्या शिकायत में लगाए गए आरोप अपराध के मूल तत्त्वों का गठन करते हैं, क्या क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र की अवधारणा तुष्ट है और क्या अभियुक्त को समन जारी करने की आवश्यकता है।

95.  भोलूराम बनाम पंजाब राज्य, (2008) 9 एससीसी 140

यह एक सुस्थापित विधि है कि न्यायालय केवल अपराध का संज्ञान ले सकती है और एक बार संज्ञान लेने के बाद न्यायालय अधिकारहीन बन जाती है। संज्ञान के आदेश को पुनः नहीं सुना जा सकता है।

96.  मो. यूसुफ बनाम अशफ़ाक जहां, (2006) 1 एससीसी 627

अपराध का संज्ञान लेने से पहले मजिस्ट्रेट धारा 156 (3) के तहत अन्वेषण के लिए आदेश दे सकता है। यह मजिस्ट्रेट पर निर्भर है कि वह पुलिस अधिकारी को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का निर्देश दे। भले ही मजिस्ट्रेट धारा 156 (3) के तहत अन्वेषण का निर्देश देते हुए ऐसा न कहे कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जानी चाहिए फिर भी उक्त परिस्थिति में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करना थाना प्रभारी का कर्तव्य है।

97.  देवेंद्र प्रताप सिंह बनाम बिहार राज्य, (2019) 4 एससीसी 351

उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि धारा 197 का कठोरता से पालन करने के क्रम में लोक अधिकारी के खिलाफ अभिकथित अपराधों का लोक अधिकारी के रूप में उसके लोक कर्त्तव्यों के निर्वहन से कुछ संबंध होना चाहिए।

98.  चौधरी परवीन सुल्ताना बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, .आई.आर. 2009 एससी 1404

एक लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए सभी कार्य धारा 197 के संरक्षण में नहीं लाए जा सकते हैं। धारा 197 का अंतर्निहित लक्ष्य अधिकारियों को एक लोक सेवक पर लगाए गए आरोपों की जांच करने में सक्षम बनाना है। धारा 197 का उद्देश्य यह है कि प्राधिकारी को सशक्त करे कि कि लोक अधिकारी के विरुद्ध तुच्छ, तंग करने वाला या मिथ्या अभियोजन से प्रतिरक्षा करे जो ऐसे अधिकारी के साख को गिराने और उत्पीड़न करने के उद्देश्य से किये गये हैं। हालांकि अगर किसी लोक सेवक में निहित अधिकार का दुरुपयोग उन चीजों को करने के लिए किया जाता है, जिन्हें कानून के तहत अनुमति नहीं है, इस तरह के कृत्य धारा 197 के संरक्षण का दावा नहीं कर सकते।

99.  विष्णु चन्द्र गांवकर बनाम एन. एम. देसाई, (2018) 5 एससीसी 422

धारा 195 (1) (बी) (ii) केवल उन मामलों में लागू होती है, जिनमें अपराध किसी ऐसे दस्तावेज के संबंध में किया गया हो जो पहले किसी न्यायालय की कार्यवाही में इस्तेमाल किया गया हो अथवा साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया हो। कहने का तात्पर्य यह है कि अपराध तब किया गया होगा जब दस्तावेज कस्टोडिया लेगिस (अभिरक्षा विधि) में था और उससे पहले नहीं।

100.  के. के. मिश्रा बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2018) 6 एससीसी 676

धारा 199 (2) और 199 (4) के तहत बचाव लेने हेतु कथन न केवल मानहानिकारक होने चाहिए, बल्कि कथन और सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन के बीच संबंध होना चाहिए।

101.  पी. सी. जोशी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, .आई. आर. 1961 एस सी 387

धारा 199 (2) के तहत प्रदान की गई विशेष प्रक्रिया का औचित्य यह है कि इसमें उल्लिखित कार्य करने वाले अधिकारियों के खिलाफ मानहानि का अपराध वास्तव में राज्य के खिलाफ किया गया अपराध है और राज्य के अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यों के निर्वहन से संबंधित है।

102.  गुजरात राज्य बनाम अफरोज मोहम्मद हसनफत्ता, 2019 (2) जेटी 212

सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस रिपोर्ट पर स्थापित मामले में एक मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को व्याख्यायित किया। न्यायालय ने धारित किया कि मजिस्ट्रेट को अभियुक्त को बुलाने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह मामले की गुणों और अवगुणों की जाँच करे अथवा देखे कि दोषी को समर्थन देने के लिए एकत्र की गई सामग्री पर्याप्त है या नहीं। पुलिस रिपोर्ट पर लगाए गए मामलों में आरोपियों को बुलाने के लिए मजिस्ट्रेट को कारणों को रिकॉर्ड करने की आवश्यकता नहीं है।

103.  एस. के. मिगलानी बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य, (2019) 6 एससीसी 111

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि राष्ट्रीयकृत बैंक में काम करने वाला लोक सेवक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 की मंजूरी के लाभका दावा नहीं कर सकता है।

104.  मीनू कुमारी बनाम राज्य, .आई.आर. 2006 एससी 1937

जब मजिस्ट्रेट ने संज्ञान नहीं लेने और कार्यवाही को बंद करने का फैसला कर लिया उस स्थिति में सूचना देने वाले को नोटिस और सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।

 

मजिस्ट्रेट को परिवाद करने की स्थिति में

(COMPLAINTS TO MAGISTRATE)

105.  मनहारी भाई बनाम शैलेष भाई, (2012) 10 एससीसी 517

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संहिता की धारा 202 में दो उद्देश्य निहित हैं-

1.      यह मजिस्ट्रेट को अभियुक्त के उत्पीड़न को रोकने के लिए परिवाद के साथ आरोपों की जांच करने में सक्षम बनाता है।

2.      यह मजिस्ट्रेट को यह पता लगाने में मदद करता है कि परिवाद में आरोपों का समर्थन करने के लिए कुछ सामग्री है या नहीं।

106.  पूनम चन्द्र जैन बनाम फज़रू, (2010) 2 एससीसी 631

परिवाद को खारिज करने का आदेश न तो उन्मोचन का आदेश है और न ही दोषमुक्ति का आदेश है, इसलिए, धारा 300 के तहत प्रावधानित सिद्धांत मान्य नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दूसरे परिवाद पर विचार किया जा सकता है। ये परिस्थितियां कुछ इस प्रकार हो सकते हैं-

1.      खारिज का पिछला आदेश अपूर्ण रिकॉर्ड पर पारित किया गया था;

2.      पिछला आदेश परिवाद की प्रकृति की गलतफहमी का परिणाम था अथवा प्रकट रूप से बेतुका या अन्यायपूर्ण था।

3.      जहां दूसरा परिवाद में उन नए तथ्यों को प्रस्तुत किया गया जिन्हें उचित सावधानी के बिना पिछली कार्यवाही में रिकॉर्ड पर न लाया गया हो।

107.  एस. आर. सुकुमार बनाम एस. सुनाद रघुराम, (2015) 9 एससीसी 609

संहिता में कोई सक्षम प्रावधान नहीं है जो परिवाद में संशोधन की अनुमति देता है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर ऐसा संशोधन किए जाने की मांग की गई है, तो एक साधारण कमी से संबंधित है और जो एक औपचारिक संशोधन के माध्यम से सुधारा जा सकता है तथा इस तरह के संशोधन की अनुमति देने से कोई पक्षपात नहीं हो सकता है, तो इस तथ्य के बावजूद कि इस तरह के संशोधन के विचार के लिए संहिता में कोई सक्षम प्रावधान नहीं है, न्यायालय इस तरह के संशोधन को करने की अनुमति दे सकता है।

108.  अभिजीत पवार बनाम हेमंत मधुकर निम्बालकर, (2017) 3 एससीसी 528

आदेशिका जारी करने से पहले धारा 202 के तहत जांच करने या जांच का संचालन करने की आवश्यकता एक औपचारिकता मात्र नहीं है। धारा 202 के तहत जांच का कोई विशिष्ट तरीका प्रदान नहीं किया गया है। धारा 200 के तहत परिकल्पित जांच में, शिकायतकर्ता की जांच केवल गवाह (यदि कोई हो) की जांच के विकल्प के साथ आवश्यक है। जब 202 में जांच की जाती है तो साक्षियों की परीक्षा की जाती है, जबकि धारा 200 के अंतर्गत केवल परिवादों की परीक्षा आवश्यक है, किंतु साक्षियों की परीक्षा वैल्पिक है।

109.  चांद देवी डागा बनाम मंजू के हूमातनी, (2018) 1 एससीसी 71

मृतक शिकायतकर्ताओं के विधिक उत्तराधिकारियों को वारंट मामले में शिकायतकर्ता की मृत्यु के बाद भी कार्यवाही जारी रखने का अधिकार है।

 

आदेशिका का जारी किया जाना

(ISSUE OF PROCESS)

110.  इंडिया कैरेट प्राइवेट लिमिटेड बनाम कर्नाटक राज्य, 1989 2 एससीसी 132

आदेशिका जारी करने की प्रक्रिया के चरण में, मजिस्ट्रेट का संबंध मुख्य रूप से परिवाद में लगाए गए आरोपों से है और उन्हें केवल प्रथम दृष्टया संतुष्ट होना चाहिए कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है। मामले के गुण या अवगुणों की विस्तृत अनुशीलन करना मजिस्ट्रेट का क्षेत्राधिकार नहीं है।

111.  गुरुबचन सिंह बनाम पंजाब राज्य, एआइआर 1957 एससी 623

अभियुक्त व्यक्ति को तथाकथित कथनों और दस्तावेजों की प्रतियाँ उपलब्ध कराने का उद्देश्य जांच या विचारण की प्रक्रिया के समय उसे क्या करना है तथा उसे अपने बचाव के लिए स्वयं को तैयार कराना है।

112.  प्रभु दत्त तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2018 13 सुप्रीम एससीसी 609

एक निजी परिवाद के आधार पर अभियुक्त को समन करने के प्रक्रम पर मजिस्ट्रेट का समाधान करना कि वर्णित अभिलेखों और अभियुक्त द्वारा पेश किए गए साक्ष्य के प्रकाश में अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही के पर्याप्त आधार है।

113.  पी. गोपालकृष्णन उर्फ दिलीप बनाम केरल राज्य, 2019 सुप्रीम (एससी) 1306

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मजिस्ट्रेट, विवेचना अधिकारी द्वारा प्रस्तुत किसी भी दस्तावेज को जिसमें पुलिस रिपोर्ट सम्मिलित है को रोक नहीं सकता सिवाय अत्यधिक मात्रा में प्रस्तुत दस्तावेजों के और ऐसे अत्यधिक मात्रा में प्रस्तुत दस्तावेजों की स्थिति में अभियुक्त को संबंधित दस्तावेज के निरीक्षण करने के लिए या तो व्यक्तिगत रूप से या अपने अधिवक्ता के माध्यम से प्राप्त करने की अनुमति दी जा सकती है।

 

आरोप

(CHARGE)

114.  माला सिंह बनाम हरियाणा राज्य, (2019) 5 एस.सी.सी. 127

सी.आर.पी.सी. की धारा 216, 386 और 464 के संयुक्त पठन से पता चलता है कि यदि अभियुक्त या अभियोजन पर किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह न हो, तो उन आरोपों में परिवर्तन अपीलीय न्यायालय सहित, न्यायालय की शक्तियों और अधिकारिता के भीतर हो सकता है। यह तभी होता है जब आरोप लगाने में चूक, शुरू में या कार्यवाही की समाप्ति या अपीलीय चरण में, न्याय की विफलता या पूर्वाग्रह का कारण बनता है, उसी के परिमामस्वरूप उपयुक्त मामले में विचारण का खराब करना हो सकता है।

115.  बिरिछ भुइयां बनाम बिहार राज्य, एआइआर 1963 एससी 1120

आरोप को व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध के विरुद्ध लगाए गए विशिष्ट आरोपों के स्पष्ट विवरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

116.  स्टेट बनाम अनूप कुमार श्रीवास्तव, (2017) 15 एससीसी 560

आरोप का विरचन आपराधिक विचारण का पहला बड़ा कदम होता है, यहाँ न्यायालय से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य को लागू करे और अभियुक्त को उन्मोचन करने या विचारण करने की आवश्यकता पर विचार करे। आरोप विरचित करने के चरण में विचारण न्यायालय द्वारा कथित रूप से अपराध की स्थापना के लिए अभियोजन या तथ्य की पर्याप्तता से प्रस्तुत सामग्री की जांच और आकलन नहीं करना है। जहां न्यायालय को पता चलता है कि अभियुक्त ने अपराध किया है, उपहारित करने के लिए है तब वह आरोप विरचित करेगा। यह अवधारणा करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। इस स्तर पर इस मामले के गुणों और अवगुणों का विचार नहीं किया जा सकता है।

117.  वी. सी. शुक्ला बनाम राज्य, एआइआर 1980 एससी 962

आरोप अभियुक्त को सूचना या जानकारी देने के उद्देश्य को फलीभूत करता है, जो अभियोग के प्रकृति की स्पष्ट सूचना देता है, यह अभियुक्त को इस बात का स्पष्ट अनुमान लगाने में समर्थ बनाता है जिससे उसे पता चला कि उसके विरुद्ध न्यायालय में किस वजह से कार्यवाही हो रही है। यह आपराधिक विचारण का एक महत्त्वपूर्ण चरण है और यह जांच के चरणों को विचारण से अलग करता है।

118.  विली स्लाने बनाम मध्य प्रदेश राज्य, एआइआर 1956 एससी 116

आरोप का उद्देश्य अभियुक्त को उस मामले का सूचना देना है जिस पर वह आरोपित है। यदि आवश्यक सूचना उन्हें दी जाती है और आरोपों के कारण उस पर कोई पूर्वाग्रह नहीं है, तो अभियुक्त केवल यह दिखाकर सफल नहीं हो सकता है कि लगाए गए आरोप दोषपूर्ण थे।

119.  मोहन सिंह बनाम बिहार राज्य, (2011) 9 एससीसी 272

आरोप विरचित करने का उद्देश्य अभियुक्त को अभियोग की प्रकृति के बारे में जानकारी देना है जिसका परीक्षण करने के लिए उसे विचारण के दौरान बुलाया जाएगा।

120.  जसविंदर सैनी बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य), (2013) 7 एससीसी 256

संहिता, न्यायालय को पर्याप्त शक्ति देता है कि वह किसी आरोप को ट्रायल कोर्ट द्वारा या अपीलीय न्यायालय द्वारा परिवर्तित करे या संशोधित करे।

121.  नित्य धर्मानंद बनाम गोपाल शीलम रेड्डी, (2018) 2 एससीसी 93

आरोप विरचित करने के चरण में अभियुक्त संहिता की धारा 91 को सामान्य रूप से लागू नहीं कर सकता है। हालांकि, न्यायालय न्याय के हित में धारा 91 के तहत शक्ति का प्रयोग करने से वर्जित नहीं है। न्यायालय को इस बात से संतुष्ट होना होगा कि अन्वेषणकर्ता के पास उपलब्ध सामग्री, जिसे चार्जशीट का हिस्सा नहीं बनाया गया है, यह आरोप विरचन के बिंदु पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है। इस प्रकार, सामान्यतौर पर न्यायालय को आरोप-पत्र विरचित करने के लिए चार्जशीट के साथ प्रस्तुत सामग्री के आधार पर आगे बढ़ना पड़ता है, लेकिन अगर न्यायालय संतुष्ट है कि अन्वेषणकर्ता ने न्याय सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों को अपने पास रोक रखा है, तो न्यायालय उसे समन करने के लिए वर्जित नहीं है।

122.  रुक्मिणी नार्वेकर बनाम विजय सतार्डेकर, एआइआर 2009 एससी 1013

आरोप विरचित करने के चरण में अभियुक्त के लिए अपनी ओर से प्रस्तुत सामग्री के समर्थन में कोई साक्ष्य प्रस्तुत करने की कोई गुंजाइश नहीं है और इस चरण में मजिस्ट्रेट केवल ऐसी सामग्री के रूप में जो धारा 227 दंड प्रक्रिया संहिता में वर्णित की गई है, पर ध्यान दे सकता है।

123.  वीनूभाई रणछोड़भाई पटेल बनाम राजीवभाई दुदाभाई पटेल, (2018) 7 एससीसी 743

त्रुटिपूर्ण, अनियमित या विनिर्दिष्ट आरोप की अनुपस्थिति में तब तक दोषसिद्ध को अवैध नहीं ठहराते जब तक कि न्याय की विफलता नहीं हुई हो।

124.  झारखंड राज्य बनाम लालू प्रसाद यादव, (2017) 8 एससासा 1

अलग-अलग विचारण एक नियम है और संयुक्त विचारण एक अपवाद है। संयुक्त विचारण असंभव होगा यदि न्यायालय अनुज्ञा देता है कि, असंख्य अपराधों को जो लंबे समय में किये गये हैं और बड़ी संख्या में व्यक्तियों द्वारा गठित होते हैं जो एक साजिश के तहत उसका बचाव करते हैं।

125.  राज्य बनाम एस. सेल्वी, (2018) 13 एससीसी 455

आरोप विरचित करते समय अभिलेख पर संभावित प्रमाणित सामग्री के मूल्य को समझना चाहिए, जो इस अवधारणा पर निर्भर करता है कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सामग्री सही है लेकिन न्यायालय को मामले की गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। यदि दो विचार समान रूप से संभव हैं और न्यायाधीश प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर संतुष्ट हैं कि कुछ संदेह है, लेकिन गंभीर संदेह नहीं है, तो उन्हें अभियुक्त को दोषमुक्त करना उचित ठहराया जाएगा।

126.  सचिर कुमार सिंहराहा बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2019) 8 एस.सी.सी. 371

अपराधिक विचारण अभियुक्तों के दोषी या निर्दोषिता का पता लगाने के लिए किया जाता है। न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वे तर्कसंगत दृष्टिकोण अपनाएँ और साक्ष्य को उसके आंतरिक मूल्य के अनुसार मूल्यांकन करें। परंपरागत कट्टरता, उच्च्चतकनीकी दृष्टिकोण को विवेकपूर्ण, यथार्थवादी और वास्तविक दृष्टिकोण द्वारा बदलना होगा।

 

विचारण

(TRIAL)

127.  हरचंद सिंह बनाम हरियाणा राज्य, 1974 एस सी आर (1) 583

यह अभियुक्त के अपराध या निर्दोषता को निर्धारित करने के लिए कार्यवाही के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। विचारण हमेशा दोषमुक्ति या दोषसिद्धि में समाप्त होता है। विचारण का उद्देश्य यह पता लगाना है कि अभियुक्त दोषी है या नहीं।

128.  बी. . उमेश बनाम उच्च न्यायालय कर्नाटक, (2017) 4 एससीसी 124

दोषसिद्ध व्यक्ति को दण्ड के प्रश्न पर सुनवाई का अधिकार है, लेकिन दण्ड पर सुनवाई के लिए अलग तारीख तय करने पर कोई आज्ञापक प्रावधान नहीं है। यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि दण्ड पर सुनवाई के लिए अलग तारीख की आवश्यकता है या नहीं।

129.  भारत संघ बनाम प्रफुल्ल कुमार, 1979 सीआरएलजे 154 (एससी)

धारा 227 के तहत आरोप विरचित करने के प्रश्न पर विचार करते हुए न्यायालय के पास यह अधिकार है कि वह अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्यों को जांच परख सकती है जो कि यह जानने के सीमित उद्देश्य के लिए बनाया गया है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कोई झूठा आरोप बनता है या नहीं।

130.  मलकीयत सिंह बनाम पंजाब राज्य, (1991) 4 एससीसी 341

दण्ड पर सुनवाई केवल मौखिक सुनवाई तक ही सीमित नहीं है, वरन यह अभियुक्त के साथ-साथ अभियोजन पक्ष को भी अवसर प्रदान करता है जिससे वह न्यायालय के समक्ष दण्ड के प्रश्न से संबंधित विभिन्न तथ्यों/सामग्रियों को रख सके और यदि दोनों फक्षों की अभिरुचि हो, तो ऐसे साक्ष्यों को जोड़ सके जो वह परिस्थितियाँ दर्शाएं, जिनसे दण्ड कम करने के दावे को मजबूती प्रदान हो। इसलिए, अभियुक्त को दण्ड के प्रश्न पर सुनवाई के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।

131.  गोवा राज्य बनाम जोस मारिया अल्बर्ट वेल्स, (2018) 11 एससीसी 659

पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित मामलों के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं और पुलिस रिपोर्ट से भिन्न किए गए मामलों के बीच अंतर इस तथ्य में निहित है कि पूर्व में, उस स्तर पर जहां मजिस्ट्रेट को विचार करना है कि क्या है आरोप विरचित है या नहीं, किसी भी साक्षी की परीक्षा के लिए अभियोजन के पास कोई अवसर है या नहीं।

 

जाँच एवं विचारण : सामान्य सिद्धांत

(INQUIRIES & TRIAL: GENERAL PRINCIPLES)

132.  रोहतास बनाम हरियाणा राज्य, (2019) 10 एस.सी.सी. 554

मामूली विसंगतियों से असम्यक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए, जो मामले के केंद्र में न जाए और अभियोजन पक्ष के गवाह के मूल रूप को न हिलाएं। यह विशेष रूप से तब सच है जब अभियोजन पक्ष के मामले की पुष्टि चिकित्सा और न्यायालयिक साक्ष्य द्वारा की जाती है।

133.  नरेंद्र कुमार श्रीवास्तव बनाम बिहार राज्य, (2019) 3 एस.सी.सी. 318

धारा 340 का उद्देश्य यह निश्चित करना है कि न्याय के प्रशासन को प्रभावित करने वाला कोई अपराध न्यायालय में पेश किए गए या दिए गए किसी दस्तावेज के संबंध में उस समय किए गए या दिए गए किसी दस्तावेज के संबंध में किया गया था। जब दस्तावेज या साक्ष्य विधि अभिरक्षा में था और क्या न्याय के हित में इस तरह की कार्रवाई करना समयोचित है। न्यायालय न केवल प्रथम दृष्ट्या मामले का पता लगाने के लिए है बल्कि यह देखने के लिए भी है कि क्या आपराधिक कार्रवाइयों को संस्थित किए जाने की अनुमति देना लोक हित में है।

134.  सी बी आई बनाम मोहम्मद परवेज अब्दुल कय्यूम, (2019) 12 एस.सी.सी. 1

जब प्रत्यक्ष एवं चिकित्सीय साक्ष्य में विरोधाभास होता है तो प्रत्यक्ष साक्ष्य अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यह केवल ऐसे मामले में है जहां चिकित्सीय साक्ष्य प्रत्यक्ष साक्ष्य को पूर्ण रूप से असंभव बनाता है, इस प्रकार के प्रत्यक्ष साक्ष्य को छोड़ देना चाहिए, अन्यथा नहीं।

135.  राजेश बनाम हरियाणा राज्य, 2020 एस.सी.सी. ऑनलाइन एससी 900

एक टी आई पी के दौरान पहचान का इरादा आरोपी की पहचान को आश्वासन देना है। अपराध का निष्कर्ष पूरी तरह आरोपी के शिनाख्त परेड की सुनवाई से इंकार पर आधारित नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने निम्नांकित सिद्धांतों का सार दिया-

1.      एक टी आई पी आयोजित करने का उद्देश्य यह है कि घटना के समय अपराधी को देखने का दावा करने वाले लोग उन्हें बिना किसी स्रोत के शिक्षण या सहायता के अन्य व्यक्तियों में से पहचान लेते हैं। शिनाख्त परेड, दूसरे शब्दों में, गवाहों की स्मृति को जांचती है ताकि अभियोजन के लिए पता लगाया जा सके कि किसी को भी या सभी को इस अपराध के चश्मदीद गवाह की तरह पेश किया जा सकता है या नहीं।

2.      शिनाख्त परेड अपराध की अन्वेषण के चरण से संबंधित है और ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके द्वारा अन्वेषण एजेंसी को उसके टी.आई.पी. के दावे पर अधिकार देने या देने के लिए बाध्य किया जाता है।

3.      शिनाख्त परेड को सी.आर.पी.सी. की धारा 16.2 के प्रावधान द्वारा उस संदर्भ में शासित किया जाता है।

4.      साधारणतः अभियुक्त की गिरफ्तारी के तुरंत बाद एक टी आई पी आयोजित किया जाना चाहिए, ताकि अभियुक्त के समक्ष रखने से पूर्व साक्षियों को दिखाए जाने की सभावना को रोका जा सके;

5.      न्यायालय में आरोपियों की पहचान मूल साक्ष्य का गठन करती है;

6.      अभियुक्त व्यक्ति की पहचान स्थापित करने वाले तथ्य साक्ष्य अधिनियम की धारा 9 के तहत प्रासंगिक माने जाते हैं;

7.      यदि आवश्यक हो तो कोई टी आई पी न्यायालय में साक्षी की पहचान को संपुष्टि प्रदान कर सकता है;

8.      विवेकशीलता के नियम के रूप में, न्यायालय, सामान्यतया, पहले की पहचान कार्यवाही के रूप में, न्यायालय में अभियुक्त की साक्षी की पहचान के साक्ष्य की खोज करेगा। विवेकशीलता का नियम अपवाद के अधीन होता है जब न्यायालय किसी साक्षी विशेष के साक्ष्य पर, ऐसे या अन्य संपुष्टि के बिना, भरोसा करना सुरक्षित मानता है।

9.      चूंकि किसी टी आई पी के मूल साक्ष्य का गठन नहीं होता है अतः उसे पकड़े रखने में असफलता वास्तविक रूप से पहचान के साक्ष्य को अस्वीकार्य बनाती है।

10.   इस प्रकार की पहचान के साथ जुड़ा हुआ भार उस विशेष मामले की परिस्थितियों में न्यायालय द्वारा निर्धारित किया जाने वाला मामला है

11.   प्रत्येक मामले में जहां अपराध की स्थापना उन परिस्थितियों के आधार पर की जाती है जिससे प्रकृति और साक्ष्य की गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जाता है, टी आई पी या अदालत में आरोपी की पहचान आवश्यक नहीं है; तथा

12.   तथ्य का न्यायालय, प्रत्येक मामले के संदर्भ और परिस्थितियों में, यह निर्धारित कर सकता है कि क्या एक टी आई पी में भाग लेने से इंकार करने के लिए अभियुक्त के विरुद्ध एक प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। हालांकि, न्यायालय अभियुक्त के अपराध के संबंध में निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले, एक पर्याप्त प्रकृति की पुष्टि करने वाली सामग्री की खोज करेगा।

136.  अंकुश मारुति शिंदे बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2019) 15 एस.सी.सी. 470

अनुच्छेद 20 और 21 के अधीन परिकल्पित निष्पक्ष विचारण में निष्पक्ष जांच शामिल है। पुलिस की भूमिका प्राण, स्वतंत्रता और संपत्ति के एक संरक्षक के रूप में है। जांच का उद्देश्य अन्ततोगत्वा है सच्चाई की खोज करना और अपराधी को दंडित करना है।

137.  खत्री (2) बनाम बिहार राज्य, (1981) 1 एससीसी 627

निःशुल्क विधिक सहायता प्रदने करने का संवैधानिक दायित्व न केवल तब ही उत्पन्न होता है, जब विचारण आरंभ होता है, वरन तब भी जब अभियुक्त प्रथम बार मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत होता है और तब भी जब उसे समय-समय पर रिमांड में रखा जाता है।

138.  प्रीतम सिंह बनाम पंजाब राज्य, एआइआर 1956 एससीसी 415

धारा 300 के प्रावधान पूर्व न्याय (Res Judicata) अथवा एस्टॉपल (Issue Estoppel) के सिद्धांत पर आधारित हैं। इसका तात्पर्य है कि सक्षम न्यायालय द्वारा दिया गया दोषमुक्त होने का निर्णय, पश्चातवर्ती सभी कार्यवाहियों में पक्षकारों पर बाध्यकारी होगा।

139.  अमीर हमजा शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2019) 8 एससीसी 357

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि यद्यपि मजिस्ट्रेट पीड़ित को अभियोजन चलाने मात्र के प्रश्न पर अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं है, पर पीड़ित मजिस्ट्रेट के समक्ष विचारण में कोई भी सहायता देने का अधिकार रखता है। यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट होता है कि पीड़ित कोई सहायता देने की स्थिति में है और विचारण किसी ऐसी दुविधा में लिप्त नहीं जो कि पीड़ित द्वारा सनिपत्रित नहीं किया जा सकता तो मजिस्ट्रेट अपने क्षेत्राधिकार में अनुमति प्रदान करेगा।

140.  मोहनलाल शामजी सोनी बनाम भारत संघ, एआइआर 1991 एससीसी 1346

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि जब तक कि न्यायालय आपराधिक कार्यवाही में किसी भी साक्षी को बुलाने अथवा किसी भी ऐसे साक्षी जिसकी परीक्षा पहले हो चुकी है को फिर से बुलाने के लिए न्यायालय की शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है, भले ही दोनों पक्षों के साक्ष्य लंबे समय से बंद हों।

141.  शिवधन पासवान बनाम बिहार राज्य, (1987) 1 एससीसी 288

जब धारा 321 के तहत एक आवेदन किया जाता है, तो न्यायालय यह पता लगाने के लिए कि मामला दोषसिद्धि अथवा दोषमुक्ति करने में समाप्त होगा, में साक्ष्यों का आकलन करना आवश्यक नहीं है। न्यायालय को यह देखना होगा कि क्या आवेदन लोक नीति और न्याय हित में तथा सद्भावपूर्वक किया गया है और क्या यह विधि की प्रक्रिया को विफल या निष्फल तो नहीं करती है।

142.  अब्दुल करीम बनाम कर्नाटक राज्य, (2000) 8 एससीसी 710

अभियोजन के प्रत्याहरण की अनुमति तब नहीं दी जा सकती है यदि जब यह विधि की प्रक्रिया को रोक देगा अथवा निष्फल या विफल कर देगा।

143.  सुक दास बनाम अरुणाचल केंद्र शासित प्रदेश, एआइआर 1986 एससी 911

विचारण से एक अभियुक्त की दोषसिद्धि जिसमें उसे विधिक सहायता प्रदान नहीं की गई थी, अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

144.  हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य, (2014) 3 एससीसी 92

 

सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 319 के संबंध में निम्नलिखित दिशा-निर्देशों को जारी किया-

1.      'साक्ष्य' शब्द को व्यापकतौर पर समझना होगा और इसे विचारण के दौरान प्रस्तुत विचारण तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। धारा 319 के तहत विचारण आरंभ होने के पूर्व न्यायालय के समक्ष आई सभी सामग्री जो जांच में आई है साक्ष्य की सम्पुष्टि को जा सकती है जो बाद में विचारण हेतु न्यायालय में अभिलिखित साक्ष्यों के सम्पुष्टि के लिए न्यायालय के समक्ष आने वाली सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है।

2.      'साक्ष्यों' को प्रतिपरीक्षा में नहीं परखना चाहिए। इसकी शक्ति का प्रयोग मुख्य परीक्षा के आधार पर भी किया जा सकता है।

3.      धारा 319 के तहत व्यक्ति को बुलाने के लिए आवश्यक संतुष्टि का स्तर आरोप विरचन के समान है।

4.      एक व्यक्ति जिसका नाम एफआईआर में नहीं या जिसका नाम एफआईआर में है, लेकिन उसके विरुद्ध आरोप पत्र नहीं बना है, अथवा ऐसा व्यक्ति जिन्हें उन्मोचित कर दिया गया है, उन्हें धारा 319 के तहत समन किया जा सकता है।

145.  राजेश बनाम हरियाणा राज्य, (2019) 6 एससीसी 368

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि एक विचारण धारा 319 के तहत उन व्यक्तियों को समन कर सकती है, जिनका नाम एफआइआर में है, लेकिन जिनके विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया है, भले ही परिवादकर्ता को विरोध याचिका दर्ज करने के लिए अवसर देने का चरण खत्म हो गया हो।

146.  एस. मोहम्मद इस्पहानी बनाम योगेन्द्र चंदक, (2017) 16 एससीसी 226

धारा 319 उन व्यक्तियों को दायरे में लेती है, जिन्हें चार्जशीट दाखिल किए जाने के समय आरोपी नहीं बनाया गया था, लेकिन विचारण के दौरान न्यायालय ने पाया कि उन्हें समन करने और विचारण का सामना करने के लिए अभिलेख पर पर्याप्त साक्ष्य हैं। धारा 319 के तहत प्राप्त शक्ति एक विवेकाधीन और असाधारण शक्ति है और इसे संयम से इस्तेमाल किया जाना है।

147.  झारखंड राज्य बनाम लालू प्रसाद यादव, (2017) 8 एससीसी 1

संविधान के अनुच्छेद 20 (2) में प्रावधानित है कि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजन तथा दंडित नहीं किया जाएगा। इसे दोहरे खतरे (double jeopardy) का सिद्धांत कहा जाता है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य उत्पीड़न से बचाना है जो उत्तरवर्ती आपराधिक कार्यवाही के कारण हो सकता है, जहां व्यक्ति ने केवल एक ही अपराध किया है। यह सिद्धांत नीमो डिबेट बिस बेक्सारी (Nemo Debet Bis Vexari) सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दोषसिद्ध नहीं किया जाएगा। दोहरे खतरे (double jeopardy) के सिद्धांत के दो पहलू हैं अर्थात् ऑस्ट्रिफॉइस कन्विक्ट (Austrefois Convict) और ऑस्ट्रिफोइस एक्विट (Austrefois Acquit) ऑस्ट्रिफॉइस कन्विक्ट का तात्पर्य है कि एक व्यक्ति को पहले उसी अपराध के संबंध में दोषी ठहराया जा चुका है। ऑस्ट्रिफोइस एक्विट का अर्थ उस व्यक्ति को पहले उसी अपराध के संबंध में दोषमुक्त कर दिया गया है।

148.  रतनलाल बनाम प्रह्लाद जाट, (2017) 9 एससीसी 340

 

धारा 311 को न्यायालय को सत्य का पता लगाने और उचित निर्णय देने में सक्षम बनाने के लिए अधिनियमित किया है। इस प्रावधान के अनुसार न्यायालय किसी भी स्तर पर जांच, विचारण या अन्य कार्यवाहियों के लिए किसी भी व्यक्ति को एक साक्षी के रूप में सम्मन कर सकती है या किसी ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति में भी जाँच कर सकती है जिसे आधिकारिक रूप से साक्षी के रूप में समन नहीं किया गया है या किसी ऐसे व्यक्ति को जिसे पहले समन जा चुका है को पुनर्परीक्षा के लिए दोबारा समन कर सकती है। इस प्रावधान का उद्देश्य अभियुक्त, अभियोजन और समाज के दृष्टिकोण से न्याय करना है। इस शक्ति का प्रयोग केवल मजबूत और ठोस कारणों के लिए ही किया जाना चाहिए।

149.  एडमंड एस. लिंगदोह बनाम मेघालय राज्य, (2016) 15 एससीसी 572

किसी अभियुक्त की दोषसिद्धि को केवल धारा 313 के तहत कथनों के आधार पर बरकरार नहीं रखा जा सकता है। इस तरह के कथन केवल अभियुक्तों के विवरण हैं जो उनके द्वारा अपराध करने के पीछे की परिस्थितियों को बताते हैं। इस तरह के कथनों को अलग से नहीं बल्कि अन्य अभियोजन साक्ष्यों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।

150.  बसवराई पिल्लै बनाम कर्नाटक राज्य, (2000) 8 एससीसी 740

शब्द 'व्यक्तिगत रूप से' जिसका प्रयोग धारा 313 में किया गया है उसकी अगर कठोर निर्वचन करें तो उसका तात्पर्य यह होगा कि अभियुक्त को न्यायालय में शारीरिक रूप से उपस्थित होना था। इस धारा को संचार और प्रसारण की तकनीक में प्रभाव के प्रकाश में देखा जाना चाहिए। तदानुसार न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यह आवश्यक नहीं है कि सभी मामलों में अभियुक्त को न्यायालय में उपस्थित होकर जवाब देना चाहिए।

151.  रेखा मुरारका बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 2019 सुप्रीम (एससी) 1286

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि हालांकि पीड़ित अभियोजन पक्ष की सहायता के लिए निजी वकील को नियुक्त कर सकता है, फिर भी ऐसे वकील को मौखिक तर्क देने या प्रतिपरीक्षा करने वाले साक्षी की परीक्षण करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

152.  स्वपन कुमार चैटर्जी बनाम सी. बी. आई. (2019) 14 एससीसी 328

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 के तहत किसी साक्षी को पुनः बुलाने के लिए लगातार आवेदन दर्ज करने को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।

153.  भाग्यन दास बनाम उत्तराखंड राज्य, (2019) 4 एससीसी 354

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक न्यायालय सामाजिक प्रभाव वाले अपराध का समन करने के लिए दाखिल याचिका को अपने विवेधिकार के आधार पर अस्वीकार कर सकती है, भले ही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 320 के तहत ऐसे अपराध शमनीय हो।

 

जमानत

(BAIL)

154.  लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित बनाम महाराष्ट्र राज्य (2017)

1.      जमानत की मंजूरी प्रथा एवं प्रक्रिया यद्यपि जमानत मंजूर करने के प्रक्रम पर साक्ष्य की ब्यौरेवार परीक्षा और मामले के गुणा व गुणों का व्यापक दस्तावेजीकरण किए जाने की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी ऐसे आदेशों में प्रथम दृष्टया यह अंतिम निष्कर्ष निकालने के कारणों को उपदर्शित करने की आंवश्यकता है कि जामनत क्यों मंजूर की जा रही थी, विशिष्ट रूप से वहां, जहां अभियुक्त को गंभीर अपराध कारित किए जाने हेतु आरोपित किया जाता है, ऐसे कारणों के बिना कोई आदेश विवेक का प्रयोग न करने से ग्रसित होगा। जमानत के लिए विचरित किये जाने वाले कारकों को अधिकथित किया गया।

2.      जमानत की मंजूरी यद्यपि अभियुक्त को जमानत की मंजूरी के लिए उत्तरोत्तर आवेदन करने का अधिकार है, फिर भी ऐसे पश्चातवर्ती जमानत आवेदनों को ग्रहण करने वाले न्यायलाय का यह कर्त्तव्य है कि वह उन कारणों एवं आधारों पर विचार करे, जिन पर पूर्व जमानत आवेदन नामंजूर किये गये थे ऐसे मामलों में, न्यायालय का यह भी कर्तव्य है कि वह नये आधारों को अभिलिखित करे, जो उसे पूर्व आवेदनों में अंगीकार किये गये मत से भिन्न मत अंगीकार करने के लिए राजी करते हैं।

3.      जमानत की मंजूरी - जमानत के अधिकार का प्रत्याख्यान केवल अभियुक्त के विरुद्ध सामुदायिक भावनाओं के कारण ही नहीं किया जाता है।

4.      जमानत की मंजूरी - जमानत मंजूर करना या मंजूर करने से इंकारी करना न्यायालय के विवेकाधिकार के अंतर्गत निहित होता है - मंजूर या प्रत्याख्यान करना व्यापक सीमा तक प्रत्येक विशिष्ट मामले के तथ्यों एवं उसकी परिस्थितियों से विनियमित होता है।

5.      जमानत की मंजूरी - विवेकाधिकार का प्रयोग जमानत मंजूर करने वलो न्यायालय को चाहिए कि वह अपने विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायिक ढंग में करे, न कि अनुक्रम के मामले के रूप में।

155.  मनीष जैन बनाम हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, [SLP (Crl) 5385/2020]

उच्चतम न्यायालय का निर्णय था कि कोई व्यक्ति अपने नियमित जमानत (Regular Bail) के रद्द होने के बाद गिरफ्तारी के मामले में अग्रिम जमानत का आवेदन दाखिल नहीं कर सकता है। इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति जमानत पर रिहा होता है वह कानून की आन्वयिक अभिरक्षा के अधीन रहता है और अभिरक्षा में व्यक्ति अग्रिम जमानत नहीं ले सकता।

156.  सुशीला अग्रवाल बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, 2020 एस.सी.सी. ऑनलाइन एस.सी. 98

धारा 438 सीआरपीसी के तहत एक व्यक्ति को दी गई सुरक्षा निरपवाद रूप से एक निश्चित अवधि तक सीमित नहीं होनी चाहिए, इसे समय पर कोई प्रतिबंध के बिना आरोपी के पक्ष में शामिल होना चाहिए। सामान्य नियम यह होना चाहिए कि किसी अवधि के संबंध में आदेश की प्रचालनों को सीमित न किया जाए। पूर्व गिरफ्तारी के जमानत के आदेश देते समय संबंधित न्यायालय द्वारा शर्ते लगाई जा सकती है, जिसमें परिस्थितियों के इस प्रकार होने पर, समय की अवधि के संबंध में आदेश के संचालन को सीमित करना और विशेष रूप से वह चरण जिस पर अग्रिम जमानत का आवेदन किया गया है, अर्थात्, चाहे वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दाखिल करने के पहले हो या उस चरण में हो जब प्रथम सूचना रिपोर्ट दायर करने की गई हो और जांच जारी है या उस चरण पर जब जांच पूरी हो जाती है और आरोपत्र दाखिल किया जाता है।

प्रत्याशित जमानत आदेश का जीवन या उसकी अवधि सामान्यतया उस समय और चरण पर समाप्त नहीं होती है जब अभियुक्त को न्यायालय द्वारा बुलाया जाता है या जब आरोप लगाये जाते हैं, किंतु वह विचारण के अंत तक जारी रह सकता है। पुनः यदि कोई विशेष या विशिष्ट विशेषताएँ हैं जिनके कारण न्यायालय को अग्रिम जमानत की अवधि सीमित करने की आवश्यकता हुई तो उसके लिए ऐसा करना संभव है।

157.  मायाकला धरम राजम एवं अन्य आदि बनाम स्टेट ऑफ तेलंगाना एवं एक अन्य, 2020 पी.एन.पी. (क्रि.) 556 (एस.सी.)

न्यायायल को केवल इस बारे में ही सलाह देनी होगी कि क्या अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है। जमानत के प्रयोजनार्थ, न्यायालय पुलिस द्वारा एकत्र किए गए साक्ष्य की सूक्ष्म जांच और उस पर टिप्पणी नहीं करेगा।

158.  मोतीराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य, एआइआर 1978 एससी 1594

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जमानत एक ऐसे व्यक्ति को उसकी उपस्थिति की प्रतिभूति को लेकर गिरफ्तारी या निरुद्धी से मुक्त करने की प्रक्रिया है। अभिव्यक्ति 'जमानत' के आधीन अभियुक्त के व्यक्तिगत पर बंधपत्र/प्रतिभूति के साथ तथा प्रतिभूति (sureties) के बिना रिहा करना दोनों आते हैं। जमानत के प्रतिभूति जो कि जमानत के याचक को भरनी पड़ती है, अप्रत्याशित रूप से बढ़ाकर जमानत पर छोड़े जाने के अधिकार को अप्रत्यक्ष रूप से आशक्त नहीं किया जा सकता है।

159.  सुनील फूलचंद बनाम भारत संघ, एआइआर 2000 एससी 1023

व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के अंतर्गत प्रदत्त सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मौलिक अधिकारों में से एक है। जमानत पर रिहाई के आधार का सिद्धांत यह है कि अभियुक्त को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि वह दोषी सिद्ध नहीं हो जाता। जमानत पर छोड़े गए व्यक्ति को न्यायालय की प्रलक्षित अभिरक्षा में माना जाता है।

160.  गुड्डीकांती बनाम बनाम लोक अभियोजक, एआइआर 1978 एससी 429

 

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मूल नियम 'जेल नहीं जमानत' होना चाहिए, सिवाय ऐसी परिस्थितियों के जो अभियुक्त द्वारा न्याय को विफल अथवा अपराधों को दोहराने की संभावना को इंगित करती हो।

161.  शरद बनाम महाराष्ट्र राज्य, आपराधिक अपील सं. 1221 2019

 

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उच्च न्यायालय के समक्ष दाखिल अपना जमानत आवेदन वापस लेने के उपरांत, बाद में अभियुक्त सत्र न्यायालय के समक्ष जमानत आवेदन दायर कर सकता है।

162.  भारत संघ बनाम पदम नारायण, (2008) 13 एससीसी 305

 

'अग्रिम जमानत' शब्द को संहिता में परिभाषित नहीं किया गया है। यह जमानत गिरफ्तारी की आशंका में दी जाती है। जब अग्रिम - जमानत दी जाती है तो गिरफ्तारी की स्थिति में गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया जाता है। गिरफ्तारी के बाद ही अग्रिम जमानत देने वाला आदेश प्रवर्तन की स्थिति में आता है।

163.  गुरबख्श सिंह सिब्बा बनाम पंजाब राज्य, (1980) 2 एससीसी 565

 

उच्चतम न्यायालय ने अग्रिम जमानत के संबंध में निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किए-

1.      एफाईआर का पंजीबद्ध होना, धारा 438 के तहत शक्ति का प्रयोग करने के लिए एक पूर्ववर्ती शर्त नहीं है।

2.      अंतरिम आदेश लोक अभियोजक को सूचना के बिना पारित किया जा सकता है लेकिन अंतिम आदेश को पारित करने से पहले सूचना दिया जाना आवश्यक है।

3.      धारा 438 के तहत दिया आदेश अन्वेषण करने के पुलिस अधिकारी की शक्ति को प्रभावित नहीं करेगी।

4.      जहां धारा 167 (2) के तहत प्रतिप्रेषण का मामला है या साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत बरामद सामग्री को सुरक्षित करने के लिए उचित दावा किया गया है वहां धारा 438 के तहत शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

5.      अग्रिम जमानत का अनिर्बंधित (असीमित) आदेश नहीं दिया जाना चाहिए।

164.  गुरुचरण सिंह बनाम राज्य (दिल्ली प्रशासन), एआइआर 1978 एससी 179

 

जमानत देने के लिए दो सर्वोच्च मीमांसा न्याय से विफल होने की संभावना और साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ हैं। यह आवश्यक है कि अन्य पक्षों के अतिरिक्त इन दो कारकों पर उचित महत्त्व दिया जाना चाहिए।

165.  रघुबीर बनाम बिहार राज्य, (1986) 4 एससीसी 481

 

सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित परिस्थितियों को निर्धारित किया। जिनमें जमानत रद्द की जा सकती है-

1.      अनवेषण में बाधा डालता है।

2.      साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ करता है;

3.      समान अपराधों की पुनरावृत्ति करता है;

4.      फरार होना है या प्रतिभू के नियंत्रण से परे चला जाता है;

5.      प्रदत्त स्वतंत्रता का दुरुपयोग करता है।

166.  नरेश कुमार यादव बनाम वी. रविन्द्र कुमार, (2008) 1 एससीसी 632

 

प्रार्थी को यह दर्शित करना होगा कि उसके पास 'विश्वास करने का कारण' है कि उसे गैर-जमानती अपराध में गिरफ्तार किया जा सकता है। अभिव्यक्ति 'विश्वास करने का कारण' (reason to believe) के प्रयोग से दर्शित होता है कि आवेदक को युक्तियुक्त आधार पर ही गिरफ्तार किया जाना चाहिए। केवल 'आशंका' ही 'विश्वास' नहीं है, जिस कारण से प्रार्थी के लिए यह बताना पर्याप्त नहीं है कि उसे किसी प्रकार की अस्पष्ट आशंका है कि कोई व्यक्ति उसके विरुद्ध आरोप लगाने जा रहा है जिसके कारण उसे गिरफ्तार किया जा सकता है।

167.  प्रसाद श्रीकांत पुरोहित बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2018) 11 एससीसी 458

 

जमानत देते समय न्यायालय को न्यायिक तरीके से अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए न कि किसी आम प्रचलन की तरह। जमानत देने के स्तर पर साक्ष्यों की एक विस्तृत परीक्षा की आवश्यकता नहीं है। जमानत देने से पहले निम्नलिखित कारकों पर विचार किया जाना चाहिए-

1.      अभियोग की प्रकृति और दण्डादेश देने की स्थिति में दण्ड की गंभीरता,

2.      साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की उचित आशंका या परिवादकर्ता को धमकी की आशंका,

3.      आरोपों के समर्थन में न्यायालय की प्रथम दृष्टया संतुष्टि

168.  अनिल कुमार यादव बनाम राज्य, (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली), (2018) 12 एससीसी 129

 

जमानत देने के लिए सुसंगत विचारणीय पहलू -

1.      यह मानने के लिए कि क्या अभियुक्त ने अपराध किया है, कोई भी प्रथम दृष्टया या उचित विश्वसनीय आधार है या नहीं;

2.      आरोप की प्रकृति और गंभीरता;

3.      दोषसिद्ध होने की स्थिति में दण्ड की गंभीरता;

4.      अभियुक्त के फरार होने या न्याय से परास्त करने का खतरा;

5.      अभियुक्त का शील, व्यवहार, साधन, स्थिति और सामाजिक स्तर;

6.      अपराध पुनरावृत्ति की संभावना;

7.      साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की उचित आशंका;

8.      जमानत देने से न्याय के विफल होने का खतरा।

169.  मोहम्मद कुंजू बनाम कर्नाटक राज्य, (1999) 8 एससीसी 660

 

यदि अभियुक्त एक से अधिक हैं, तो अलग-अलग जमानत बंधपत्र के निष्पादन पर जोर दिया जाना चाहिए। प्रतिभू का कर्तव्य जमानत के लिए अभियुक्त को हाजिर करना है। यदि अभियुक्त को जिन नियम और शर्तों के तहत जमानत दी गई है उनमें कोई भी परिवर्तन प्रतिभू को निश्चित रूप से स्वीकार्य नहीं है, तो उसे न्यायालय में उन्हें विफल करने के लिए संसूचित करना होगा और ऐसा ना करने पर वह उत्तरदायी माना जाएगा।

170.  राज्य (दिल्ली प्रशासन) बनाम संजय गांधी, (1978) 2 एससीसी 411

 

जमानत की अर्जी दायर करते समय जमानत खारिज करना एक बात है और जमानत रद्द करना दूसरी बात है। एक बार दी गई जमानत को रद्द करने की तुलना में गैर जमानती मामलों में जमानत को अस्वीकार करना आसान है। जमानत रद्द करने में जमानत देने के पहले के निर्णयों की समीक्षा करना भी शामिल है। यह संयमित और केवल पर्यवेक्षणीय परिस्थितियों में होना चाहिए।

171.  एक्स बनाम तेलंगाना राज्य, (2018) 16 एससीसी 511

 

प्रारंभिक चरणों में गैर जमानती मामलों में जमानत की अस्वीकृति और दी गई जमानत को रद्द करने के विभिन्न आधारों पर अलग-अलग विचार किया जाना चाहिए। जमानत रद्द करने के आदेश के लिए बहुत ही ठोस और स्पष्ट परिस्थितियाँ आवश्यक हैं। एक बार दी गई जमानत को यंत्रवत और नियमित तरीके से रद्द नहीं किया जाना चाहिए। जमानत देने से पहले पर्यवेक्षणीय परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए।

172.  मौजी राम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2019) 8 एससीसी 17

 

सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि बिना किसी कारण के किसी भी आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती है, भले ही एक प्रथम दृष्टया प्रकृति के आधार पर यह जमानत देना उचित माना जाता है।

 

अपील

(APPEAL)

173.  मोहम्मद सज्जाद राजू सलीम बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 2017 (1) आरसी आर (आपराधिक) 748

 

इस मामले में दो व्यक्तियों को हत्या करने के लिए दोषी ठहराया गया था। केवल एक अभियुक्त ने दोष सिद्ध होने के विरुद्ध अपील दायर की और उसे दोषमुक्त कर दिया गया। अपील दायर न करने वाले दूसरे अभियुक्त को भी दोषमुक्त ठहराया गया। न्यायालय ने कहा कि अगर मामले के मूल्यांकन पर निष्कर्ष निकाला जाता है कि किसी भी अभियुक्त की कोई भी सजा संभव नहीं थी, तो उस निर्णय का लाभ उसी तरह के सह-अभियुक्त को भी दिया जा सकता है, भले ही उसने अपील के माध्यम से आदेश को चुनौती नहीं दी थी।

 

विविध

(MISCELLANEOUS)

174.  वेंकटसन बालासुब्रमणियन बनाम इंटेलिजेंस ऑफिसर, डी. आर. आई. बैंगलोर, (क्रिमिनल अपील नं. 801 ऑफ 2020)

सी.आर.पी.सी. की धारा 167 (2) के तहत दी गई व्यतिक्रम जमानत (Default Bail) सी.आर.पी.सी. की धारा 439 (2) के तहत रद्द कर दी जा सकती है। धारा 167 के परंतुक (Proviso) में स्पष्ट है कि धारा 167 (2) के तहत जमानत पर रिहा प्रत्येक व्यक्ति को अध्याय XXII के तहत इस प्रकार रिहा किया माना जाएगा। यदि कोई व्यक्ति 167 (2) के तहत अवैध या गलत तरीके से जमानत पर रिहा किया जाता है, तो उसकी जमानत धारा 439 (2) के तहत उचित आदेश पारित करके रद्द की जा सकती है।

175.  गार्गी बनाम हरियाणा राज्य, (2019) 9 एस.सी.सी. 738

केवल सह-अभियुक्त को बरी करने के कारण किसी अपराधिक वाद में एक अन्य अभियुक्त को बरी नहीं किया जा सकता यदि उसके विरुद्ध अकाट्य साक्ष्य उपलब्ध हों।

176.  मोहम्मद अजमल आमिर कसाब बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2012) 9 एस.सी.सी. 1

मजिस्ट्रेट और न्यायालयों का यह कर्त्तव्य है कि वह निर्धन अभियुक्त को मुफ्त कानूनी सहायता (Free Legal Aid) प्राप्त करने के उनके अधिकार के बारे में सूचित करे।

177.  संग्राम सिंह बनाम निर्वाचन प्राधिकरण, कोठ, आई आर 1955 एस सी 425

प्रक्रिया के नियम न्याय की सुविधा और उसके उद्देश्यों के लिए बनाए जाते हैं। इसलिए बहुत तकनीकी व्याख्या से बचना चाहिए। प्रक्रियागत नियमों का उदारतापूर्वक आकलन किया जाना चाहिए ताकि मूल विधि को उपयोगी तथा व्यवहार्य बनाया जा सके।

178.  केरला राज्य बनाम बाबू, (1999) 4 एस.सी.सी. 621

उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि वाद डायरी धारा 91 के अंतर्गत जारी एक दस्तावेज है और इसे न्यायालय द्वारा तलब किया जा सकता है।

179.  नित्य धर्मानंद बनाम गोपाल शीलम रेड्डी, (2018) 2 एस.सी.सी. 93

आरोप की विरचना के चरण में अभियुक्त साधारणतया कोड की धारा 91 का आह्वान नहीं कर सकता है। हालांकि, न्यायालय को न्याय के हित में धारा 91 के तहत शक्ति का प्रयोग करने से नहीं रोका गया है। न्यायालय को इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि जांच करने वाले के साथ उपलब्ध सामग्री, आरोप पत्र का हिस्सा न बनाकर, आरोप के विरचना के मुद्दे पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

180.  गुजरात राज्य बनाम श्यामलाल, आई आर 1965 एस.सी. 1251

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि धारा 91 एक आरोपी व्यक्ति पर लागू नहीं होती है। एक अभियुक्त व्यक्ति को एक दस्तावेज या वस्तु पेश करने के लिए तलब नहीं किया जा सकता, यदि वह कपटपूर्ण है या उसके विरुद्ध साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

181.  कमला बाई जेठामल बनाम महाराष्ट्र राज्य, .आई.आर. 1962 एस.सी. 1189

अपने आप में खोज बनाने में कुछ अनियमितता खोज को अवैध और एकत्रित सबूत को अस्वीकार्य नहीं बनाएगा।

182.  करतार सिंह बनाम हरियाणा राज्य, एआइआर 1982 एससीसी 1433

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 428 के तहत मुजरा का लाभ आजीवन कारावास के दोषियों के लिए उपलब्ध नहीं है।

183.  महाराष्ट्र राज्य बनाम तपस डी. न्यॉजी, (1997) 7 एससीसी 685; तीस्ता अतुल सेतलवाड बनाम गुजरात राज्य, (2018) 2 एससीसी 272

अभियुक्त या उसके किसी भी संबंधी का बैंक खाता संहिता की धारा 102 के अर्थ के अनुसार 'संपत्ति है। अन्वेषण के दौरान पुलिस अधिकारी उक्त खाते के संचालन को जब्त या प्रतिबंधित कर सकता है, अगर खाते के अपराध होने के साथ सीधे संबंध हैं।

184.  नेवादा प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य, एवं अन्य, क्रिमिनल अपील संख्या 1481/2019, 24.09.2019 को निर्धारित

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि पुलिस के पास दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के तहत अन्वेषण के दौरान चल संपत्ति कुर्क करने की शक्ति नहीं है। हालांकि, पुलिस के पास अभियुक्तों की चल संपत्तियों को स्थिर (freeze) करने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 में प्रदर्शित होने वाली किसी भी संपत्ति में अचल संपत्ति सम्मिलित नहीं समझी जाएगी।

185.  राजू जगदीश पासवान बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2019) 16 एससीसी 380

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मृत्यु दण्डादेश केवल तभी दिया जा सकता है जब अन्य वैकल्पिक विकल्प निर्विवाद रूप से बंद हो गए हों।

186.  अभियुक्त एक्स बनाम महाराष्ट्र राज्य, आपराधिक अपील संख्या 680/2207, 12.04.2017 को निर्धारित, 2019, एससीसी ऑनलाइन एससी 543

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि मृत्युदंड दिए जाने के बाद दोषियों की अपीलों पर विचार करते समय मानसिक बीमारी सजा को कम करने का एक आधार हो सकता है।

187.  न्यू इंडिया एंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कृष्ण कुमार पाण्डेय, आपराधिक अपील संख्या 1852/2019, 06.12.2019 को निर्णीत

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उच्च न्यायालय के पास दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत आदेश को वापस लेने की अंतर्निहित शक्ति है और धारा 362 के प्रावधान उच्च न्यायालय को अपनी इस शक्ति का प्रयोग करने से निवारित नहीं करती है।

188.  भारत संचार निगम लिमिटेड बनाम सूर्यनारायण एवं अन्य, आपराधिक अपील संख्या 170/2009, 13.12.2018 को निर्णीत

उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि न्यायालय के समक्ष ऐसा कोई दावा किया जाता है कि संपत्ति उस व्यक्ति की नहीं है जिससे यह जब्त की गयी है, तो सीआरपीसी की धारा 452 यह आदेशित नहीं करती है कि इसकी अभिरक्षा उस व्यक्ति को सौंपी जानी चाहिए जिसके कब्जे से यह जब्त किया गया था, जो तीसरे पक्ष की ओर से वास्तविक प्रख्यापन को दरकिनार करके किया गया है।

189.  महेश दुबे बनाम शिवबोध दुबेल, (2019) 4 एससीसी 160

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्त को दोषी ठहराते हुए यदि विचारण ने अचल संपत्ति की पुनर्प्राप्ति के लिए एक आदेश पारित किया तब 30 दिनों की समयसीमा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 456 के तहत एक आवेदन को प्राथमिकता देने में लागू नहीं होगी।

190.  भारत संघ बनाम धरम पाल, (2019) 15 एससीसी 388

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि दया याचिका खारिज होने से पहले मृत्यु दण्डादिष्ट व्यक्ति को एकान्त कारावास का दण्डादेश स्पष्टतया अवैध है।

191.  दिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम गुजरात राज्य, (1991) सी आर एल जे 3086 (एससी)

न्यायिक अधिकारी अपने. आधिकारिक या न्यायिक कर्तव्यों से संबंधित किसी कार्य के सिवाय न्यायिक अधिकारी पुलिस थाना का दौरा नहीं कर सकते हैं। यदि किसी न्यायिक अधिकारी या अधीनस्थ न्यायिक अधिकारी को अपने शासकीय कार्य के मामले में पुलिस थाना का दौरा करना आवश्यक है, तो उसे अपने जिला या सत्र न्यायाधीश को इस आशय की पूर्व सूचना देनी होगी।

192.  छन्नी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2006 सीआरएलजे 4068 (एससी)

जहां कही भी अपरोधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 प्रवर्तन में है, उन क्षेत्रों में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 360 और 361 प्रयोज्य नहीं होगा।

 

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